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जैन कालोनी और मेरा विकार-पत्र
आजकल जैन-जीवनका दिनपर दिन ह्रास होता भविष्यकी भयङ्करताका विचार करते हुए शरीरपर जा रहा है, जैनत्व प्राय: देखनेको नहीं मिलता-कहीं रोंगटे खड़े होते हैं और समझमें नहीं आता कहीं और कभी कभी किसी अंधेरे कोनेमें जुगनूके कि तब धर्म और धर्मायतनोंका क्या बनेगा। और प्रकाशकी तरह उसकी कुछ झलक सी दीख पड़ती है। उनके अभावमें मानव-जीवन कहां तक मानवजीवन जैनजीवन और अजनजीवनमें कोई स्पष्ट अन्तर नजर रह सकेगा !! नहीं आता। जिन राग-द्वेष, काम-क्रोध, छल-कपट दृषित शिक्षा-प्रणालीके शिकार बने हुए संस्कारझूठ-फरेब, धोखा-जालसाजी, चोरी-सीनाजोरी, विहीन जैनयुवक की प्रवृत्तियां भी आपत्तिके योग्य अतितृष्णा, विलासता. नुमाइशीभाव और विषय तथा हो चली हैं, वे भी प्रवाहमें बहने लगे हैं, धर्म और परिग्रहलोलुपता आदि दोषोंसे अजैन पीडित हैं उन्हीं धर्मायतनोंपरसे उनकी श्रद्धा उठती जाती है, वे अपने से जैन भी सताये जा रहे हैं। धर्मके नामपर किये लिये उनकी जरूरत ही नहीं समझते, श्रादर्शकी थोथी जानेवाले क्रियाकाण्डोंमें कोई प्राण मालूम नहीं होता बातों और थोथे क्रियाकाण्डोंसे वे ऊब चुके हैं, उनके अधिकांशमें जाब्तापूरी, लोकदिखावा अथवा दम्भका सामने देशकालानुसार जैन-जीवनका कोई जीवित ही सर्वत्र साम्राज्य जान पड़ता है। मूलमें विवेकके आदर्श नहीं है, और इसलिये वे इध न रहनेसे धर्मकी सारी इमारत डांवाडोल हो रही है। हुए जिधर भी कुछ आकर्षण पाते हैं उधरके ही हो जब धार्मिक ही न रहें तब धर्म किसके आधारपर रह रहते हैं। जैनधर्म और समाजके भविष्यको दृष्टिसे सकता है ? स्वामी समन्तभद्रने कहा भी है कि- ऐसे नवयुवकोंका स्थितिकरण बहुत ही आवश्यक है 'न धर्मो धार्मिकैर्विना'। अत: धर्मकी स्थिरता और और वह तभी हो सकता है जब उनके सामने हरसमय
उसके लोकहित-जैसे शुभ परिणामोंके लिये सच्चे जैन-जीवनका जीवित उदाहरण रहे। . . 'धार्मिकोंकी उत्पत्ति और स्थितिकी ओर सविशेषरूपसे इसके लिये एक ऐसी जैनकालोनी-जैनबस्तीके
ध्यान दियां ही जाना चाहिये, इसमें किसीको भी बसानेकी बड़ी जरूरत है जहां जैन जीवनके जीते विवाद के लिये स्थान नहीं है। परन्तु आज दशा जागते उदाहरण मौजूद हों-चाहे वे गृहस्थ अथवा उलटी है-इस ओर प्राय: किसीकाभी ध्यान नहीं है।
साध किसी भी वगेके प्राणियोंके क्यों न हों जहां पर प्रत्युत इसके देशमें जैसी कुछ घटनाएं घट रही हैं सर्वत्र मूर्तिमान जैनजीवन नजर आए और उससे और उसका वातावरण जैसा कुछ क्षुब्ध और दूषित देखनेवालोंको जैनजीवनकी सजीव प्रेरणा मिले; हो रहा है उससे धर्म के प्रति लोगोंकी अश्रद्धा बढ़ती जहांका वातावरण शुद्ध-शांत-प्रसन्न और जैनजीवनके जा रही है, कितने ही धार्मिक संस्कारोंसे शून्य जन- अनुकूल अथवा उसमें सब प्रकारके सहायक हो; जहां मानस उसकी बगावतपर तुले हुए हैं और बहुतोंकी प्राय: ऐसे ही सज्जनोंका अधिवास हो जो अपने स्वार्थपूर्ण भावनाएं एवं अविवेकपूर्ण स्वच्छन्द- जीवनको जैन जीवनके रूपमें ढालने के लिये उत्सुक हों; प्रवृत्तियां उसे तहस-नहस करने के लिये उतारू हैं; और जहां पर अधिवासियोंकी प्रायः सभी जरूरतोंको पूरा इस तरह वे अपने तथा उसे देशके पतन एवं विनाश करनेका समुचित प्रबन्ध हो और जीव का मार्ग आप ही साफ़ कर रहे हैं । यह सब देखकर उठानेके यथासाध्य सभी साधन जुटाये गये हों; जहां
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