________________
२७०
सुलोचना, चन्दना, चलना श्रादि श्रनेक सती साध्वी, श्रादर्श गृहस्थ तथा दीक्षा के पश्चात् परम तपस्विनियोंकी यशोगाथासे जैनपुराण व चारित्र ग्रन्थ भरे पड़े हैं। इन देवियोंने अपना स्वयंका ती कल्याण किया ही, अपने सम्पर्कमं श्रानेवाले अनेक पुरुषोंका भी उद्धार किया है। जब उन्हें वैराग्य हुआ और उन्होंने श्रात्मसाधन करनेकी ठानी तब ही पांत, पुत्र, परिजन, घर सम्पत्ति, भोग ऐश्वर्य सब ठुकराकर, तपस्विनी बन वनका माम लिया; पतिका कोई अधिकार या राज्य अथवा समाजका कोई कानून उन्हें ऐसा करनेसे न रोक सका ।
एतिहासिक काल में ही, जैसा कि एक विद्वानका कथन हे*, हमारे देश में जब उन्नति हो रही थी तब स्त्रियोंका खूब आदर था और वे शिक्षिता थीं। भगवान महावीर के पिता अपनी पत्नीका कैसा श्रादर करते थे यह निम्न श्लोकसे रुष्ट है:
आगच्छन्ती नृपो वीक्ष्य प्रियां संभाष्य स्नेहतः । मधुरैर्वचनैस्तस्यै ददो स्वार्धासनं मुदा ॥
अर्थात् - राजा (सिद्धार्थ) ने अपनी प्रियाको दर्बारमें नाते देखकर उनसे मधुर वाक्यांमें प्रेमपूर्वक श्रालाप किया और प्रसन्न होते हुए उन्हें अपना श्राषा सिंहासन बैठनेको दिया, जिसपर वे जाकर बैठीं ।
अनेकान्त
स्वयं भगवान महावीरने अपने ६ महीने के उपवास के पश्चात् जो पारणा किया (आहार ग्रहण किया) वह बेड़ियों में जकड़ी अति दान दीन चन्दनांके अधकचरे साबुत उड़दों जैसे तुच्छ खाद्यका था। अनेक राजा एवं धनिक श्रेष्ठी उन्हें उस समय श्रेष्ठ सुस्वादु भोजन करानेके लिये लालायित थे ! भ० महावीरने स्त्रियोंको जिनदीक्षा देने में म० बुद्ध जैसी हिचकिचाहट नहींकी सती चन्दनबालां के नेतृत्वम, मुनिसंघ के साथ ही साथ, श्रार्थिकासंघका भी निर्माण किया । वास्तव में जैनायिकासंघका यह निर्माण बौद्ध भिक्षुणी संघसे पहिले हो चुका था। भ० महावीर के अनुयायियों में मुनियों की अपेक्षा आर्यिका श्रोंकी और श्रावकोंकी अपेक्षा भाविकाची संख्या कई गुनी अधिक थी+। * जैन हितैषी वर्ष ११ अंक ३ पृ० १८६ + अनेकान्त वर्ष ३ कि० १ पृ० ४५ सौ० इन्दुकुमारीका लेख 'वीरशासन में स्त्रियोंका स्थान' ।
Jain Education International
[ वर्ष ८
उनकी समवसरण सभा में स्त्री पुरषोको साथ साथ बैठकर धर्मोपदेश सुनने और अपना २ श्रात्मकल्याण करनेका
समान अवसर प्राप्त था।
व्यवहारिक दृष्टिसे, जैनस्त्रियोने धार्मिक तथा लौकिक दोनों ही क्षेत्रों में अपनी हीनताका अनुभव कमसेकम जैनधर्मके कारण कभी नहीं किया । मध्यकालीन भारत में, विशेषकर दक्षिण प्रान्त में जहाँकि उस युग में जैन धर्मका प्रभाव एवं प्रचार था जैन स्त्रियोंने स्वयं राज्य किया, राज्यकार्यमें अपने पति पुत्रादिकोंको सक्रिय सहयोग दिया, सैन्यसन्चालन किया, ग्रन्थ निर्माण किये कराये, साहित्य प्रचार किया, धर्मप्रचार किया, मन्दिर श्रादि निर्माण कराये, धर्मोत्सव और प्रतिष्ठ यें कराई, श्राचिका और आर्यिका संघका नेतृत्व किया. अध्यान किया, उपदेश दिये, तपस्याएँकी, समाधिमरण किये इत्यादि । जैन धर्म अनुसार, पत्नी अपने पति के धर्मकार्यो और पुण्य प्रवृत्तियों में तो सहायक हो सकती हैं किन्तु वह उसके श्रधर्माचरण और पास प्रवृत्तियो में सहयोग देने या उनमें उसका अनुगमन करनेके लिये कनई बाध्य नहीं है । बिल्वमंगल जैसे उदाहरण जैन संस्कृतिमें नहीं मिलेंगे श्रौर x (i) Dr. Saletore -- Mediaeval Jainism,
ch. V-'Women as defenders of the Faith'.
(ii) Dr. B. C. Law-Distinguished
men and women in Jainism'Indian Culture Vol. Il & III. (iii) श्री त्रिवेणी प्रसाद - 'जैन महिलाओं की धर्मसेवा'जै० सि० भा० ८-२ पृ० ६१
(iv) पंडित चन्दाबाई जैन धर्मसेविका प्राचीन जैनदेवियाँ - प्रे० अ० ग्रंथ पृ० ६८४
(v) मथुरा के प्राचीन जैनपुरातत्व में अनेक जैन महिलाओंकी जिनमें गणिकायें तक भी सम्मिलित है, धर्मसेवा के उल्लेख मिलते हैं ।
(vi) सागर और मलयाचल के बीच, दक्षिणस्थ वेणूर देश में जिलवंशकी जैनरानी पदुमला देवीने सन् १६८३ से १७२१ तक राज्य किया- श्रनेकान्त २-७ पृ० ३८४
For Personal & Private Use Only
www.jainelibrary.org