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________________ वर्ष ३, किरण 5-6] धर्म बहुत दुर्लभ है ५५३ दृष्टि है, अनेकान्ती है, प्रत्येक तत्वको, प्रत्येक घटनाको उन्नति करता हुआ दूसरोंकी उन्नतिको नहीं रोकता, प्रत्येक पुरुषार्थको अनेक अपेक्षाओंसे देखने वाला है। जो अपने उठने के साथ दूसरोंको उठाता चलता है अनेक अपेक्षाओंसे समझने वाला है, जो सर्वग्राहक उभारता चलता है; वही धर्म मार्ग पर चल सकता है । है, जो अपनी दृष्टिको एकान्तमें डालकर संकीर्ण नहीं जो जितेन्द्रिय है, वशी है, शान्त चित्त है, विषयों होने देता । जो स्वहित-परहित, व्यक्तिगत हित की आसक्तिसे लक्ष्यको नहीं भूलता, कषायोंकी तीव्रतासे स्मष्टि गत हित, वर्तमान हित, भावि हित सब ही हितों कर्तव्यको नहीं छोड़ता, बाधाओंसे घबराकर धीरताको की अपेक्षासे पुरुषार्थके हेय उपादेयपनका निर्णय नहीं खोता, वही धर्म पर चल सकता है। करने वाला है, जो प्रज्ञावान है, जो साध्य और साधन, जो श्रात्म-विश्वासी है; जो सहायता-अर्थ बाह्य व्यवहार और निश्चय में से किसीकी भी उपेक्षा नहीं देवी देवताओंकी ओर नहीं देखता,उनके प्रति याचनाकरता, जो यथावश्यक अपने समय और शक्तिको सब प्रार्थना नहीं करता, उनके प्रति यज्ञ हवन, पूजा भक्ति में ही पुरुषार्थों में बाँटने वाला है । जो सदा अपनेको समय नहीं खोता, जो स्वयं आत्मशक्तियोंमें भरोसा स्थिति अनुरूप बनाने वाला है, वही धर्म-मार्ग पर चल रखने वाला है, दृढ़ संकल्प शक्ति वाला है, निर्भय है, सकता है । साहसी है, उद्यमी है, वही धर्म-मार्ग पर चल सकता ___ जो निर्मोही है; नाम-रूप-धर्मात्मक जगतमें रहता है। हुश्रा भी कभी उसको अपना नहीं मानता, कभी उसका जो सदा जागरूक और सावधान है, जो अतिक्रम, होकर नहीं रहता, जो कमल समान सदा ऊपर होकर व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचारसे अपने मार्गको दूषित रहता है, सदा अात्महितका विचार रखता है । जो नहीं होने देता । जो निरहंकार है, "मैं" और "मेरे" समस्त जगत, उसके समस्त पदार्थ, समस्त सम्बन्ध, के प्रपंचमें नहीं पड़ता; जो निष्काम है, निराकारी है, समस्त रीतिरिवाज, समस्त संस्थाप्रथा, समस्त विधि- जो कोई भी काम मान, मिथ्यात्व, निदानके वशीभूत विधान, समस्त क्रियाकर्मको व्यवहार मानता है, ऊपर होकर नहीं करता, जो अपने कियेका फल धन-दौलत, उठनेका साधन मानता है, साधन मानकर उनको पुत्र-कलत्र, मान-प्रतिष्ठा श्रादि किसी भी दुनियावी अर्थ ग्रहण करता है, रक्षा करता है, प्रयोग करता है, यथा- के रूपमें नहीं चाहता, जो अपनी समस्त शक्ति, समस्त वश्यक उनमें हेरफेर करने, सुधार करनेमें तत्पर रहता पुरुषार्थ, समस्त जीवन, ब्रह्मके लिये अर्पण करता है, है, यथावश्यक सदा 'उन्हें त्यागने, आहुति देनेमें समस्त विचार, समस्त वाणी, समस्त कर्म ब्रह्मके लिये तय्यार रहता है, वही धर्ममार्ग पर चल सकता है। होम करता है, वही धर्म-मार्ग पर चल सकता है । ___ जो अहिंसावान है, दयावान है, सबके हितमें जो कर्म-कुशल है, योगी है, जो बालक-समान अपना हित मानता है, सबके उद्धारमें अपना उद्धार एक बार ही चान्दको पकड़ना नहीं चाहता, जो सहायक मानता है; जो सबका हितैषी है, सबका मित्र है, जो शक्तियोंको बढ़ाता हुआ, विपक्ष शक्तियोंको घटाता आप रहता है दूसरोंको रहने देता है, जो खुद स्वतन्त्र हुआ, श्रेणीबद्ध मार्गसे ऊपरको उठाता है, वही धर्म है, दूसरोकी स्वतन्त्रताका श्रादर करता है, जो अपनी मार्ग पर चल सकता है ।
SR No.527163
Book TitleAnekant 1940 06 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1940
Total Pages80
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size8 MB
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