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________________ वर्ष ३, किरण ५] भगवान महावीर और उनका उपदेश ३७३ हो जाता है कि इनमें कौन नियम सांसारिक है और परन्तु इस बातका ध्यान ज़रूर रक्खें कि उनसे उनके कौन धार्मिक ? इससे धर्मकी असलियत गुप्त होकर धार्मिक श्रद्धान और धामिक आचरणमें किसी भी भारी गड़-बड़ी पड़ जाती है, और सांसारिक प्रगति भी प्रकारकी खराबी न पाने पावे । रुक जाती है, द्रव्य; क्षेत्र काल; भाव और अवस्थादि सब कुछ बदल जाने पर भी उन सांसारिक नियमोंको वीर भगवान के समयमें महात्मा बुद्ध भी अपने बौद्ध धर्मके अटल नियम मानकर ज्योंका त्यों उनका पालन धर्मका प्रचार कर रहे थे, और मगध देशमें ही अधिकहोता रहता है । हज़ार दुःख उठाने पर भी उनमें हेर- तर दोनों का विहार हुआ है । इस ही कारण वह देश फेर नहीं किया जाता है। उनके विरुद्ध करना महा अब बिहार ही कहलाने लग गया है,परन्तु वीर भगवान अधर्म और अशुभ समझा जाता है। और महात्मा बुद्ध के उपदेशोंमें प्रायः धरती-श्राकाशका अन्तर रहा है। वीर भगवानने तो वस्तु-स्वभावको ही मकान कैसा बनाया जावे, उसका दरवाजा किधर धर्म बताकर प्रत्येक बातको उसकी असलियत अच्छी रक्खा जावे. दरवाजे कितने हों और कितने ऊँचे हो. तरह ढंद पहचान कर ही मानने का उपदेश दिया है. खू टी कहाँ 'लगाई जाय और शरण कहाँ मिलाई जीवात्माको अपना सच्चा स्वरूप समझ कर ही उसकी जाय, दाढ़ी मूंछ और सिरके बाल किस तरह मुंडाये प्राप्तिके साधन में लगाया है । परन्तु महात्मा बुद्ध अपने जावें, उनका क्या ढंग रक्खा जावे, वस्त्राभूषण कैसे धर्मको वस्तु स्वभावकी बुनियाद पर खड़ा करनेसे यहां हों, सिर किस तरह ढका जाय, कपड़ा किस रंगका तक घबराये हैं कि जीवात्माका स्वरूप बतानेसे ही साफ़ पहना जाय, और किस ढंगका पहना जाय, इसी तरह इनकार कर दिया है । जगत अनादि है वा किसीका जाति और बिरादरी, आपसका बर्ताव, छूतछात, किस बनाया हुअा है, उसका अन्त हो जायगा वा नहीं, जीव के हाथका पानी पीना, किसके हाथकी कच्ची और आत्मा शरीरसे अलग कोई वस्तु है वा शरीरके ही किसी और किसके हाथकी पक्की रसोई खाना, रसोईकी सफाई स्वभाव का नाम है, मरने के बाद जीव कायम रहता है के नियम, किस खानेको कहां बैठकर खाना, किस या नहीं इन बातोंकी बाबत तो महात्मा बुद्धने साफ़ बर्तनमें खाना, कौन कौन कपड़े पहन कर खाना, शब्दोंमें ही कह दिया है कि मैं कुछ नहीं बता सकता हूं किससे ब्याह-शादी करना, मरने पर किसको वारिस इसलिए यह पता नहीं लगता है कि उनका धर्म किस बनाना, मरने जीने और ब्याह शादीमें क्या क्या रीति आधार पर टिका हुआ है । वेशक वह अहिंसाका सभी होना, यह सब सांसारिक रीतिये धर्मके तौर पर मानी उपदेश देता था, और दया धर्मको मुख्य ठहराता था, जाती हैं । और अन्य मतोंकी धर्म पुस्तकोंमें भी लिखी परन्तु उस समयमें हिंसाका प्रचार अधिक होनेके कारण पाती हैं। जिनके कारण धर्मकी असली बातें लोप होकर उसको यह पाबन्दी लगानेका भी साहस नहीं हुआ कि यह ही धर्मकी बातें बन जाती हैं। इन ही कारणोंसे उसके धर्मको अङ्गीकार करने वालेको मांस का वीर भगवान्ने अपने उपदेशमें केवल धर्मके स्वरूप ज़रूरी है । इसके अतिरिक्त उसने मरे हुए जीवोंका मांस और उसके साधनोंका ही कथन किया है । और सांसा- खानेकी तो इजाज़त दे दी थी। किन्तु वीर भगवानने जैनी के लिए माँस, मदिरा और शहद त्याग श्रावश्यक साफ़ कह दिया है कि इनका धर्मसे कोई सम्बन्ध नहीं ठहराया और मरे हुए पशुका मांस खाना भी महापाप है। यह ही कारण है कि जैन ग्रन्थोंमें सांसारिक कार्यों बताया, क्योंकि उसमें तुरन्त ही त्रस जीव पैदा होने के नियम बिल्कुल भी नहीं मिलते हैं। हां, यह सूचना लगते हैं और मांस खानेसे घणा न रहकर जीवोंको भी ज़रूर मिलती है कि गहस्थी लोग अपने लौकिक कार्य मार कर खाजानेको मन चलने लगता है । इस ही कारण - समय और अवस्थाके अनुकूल जिस तरह चाहें करें बौद्धोंमें जीते जानवरोंको भी मारकर खाजानेका बहुत
SR No.527160
Book TitleAnekant 1940 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1940
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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