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श्वेताम्बर न्यायसाहित्यपर एक दृष्टि
[ले०-५० रतनलाल संघवी, न्यायतीर्थ-विशारद]
आगम-कालक विक्रमकी तीसरी-चौथी शताब्दिके पूर्वका श्वे. क्षिकी विद्या" नामसे तर्क-शास्त्रका पता चलता है किंतु
- जैन-न्याय-साहित्यका एक भी ग्रन्थ उपलब्ध भारतीय न्याय-शास्त्रकी मज़बूत नींव डालने वाले गौतमनहीं होता है; इसके पूर्वका काल अर्थात् विक्रमसे पांच- मुनि ही हैं । इन्होंने ही सर्वप्रथम "न्याय-सूत्र" नामक सौ वर्ष पहलेसे लगा कर उसके तीनसौ-चारसौ वर्ष ग्रंथकी रचना की। इनका काल ईसाकी प्रथम शताब्दि बाद तकका काल "श्रागम-काल" है। मूल-श्रागम माना जाता है । इसी कालसे भारतीय-प्रांगणमें तर्क
और आगमिक-विषयको स्पष्ट करने वाली नियुक्तियाँ युद्ध प्रारंभ होता है और आगे चल कर शनैः शनैः एवं चूर्णियाँ ही उस समय श्वे. जैन-साहित्यकी सीमा सभी मतानुयायी क्रमशः इसी मार्गका अवलम्बन लेते थीं। आगमों पर ही जनताका ज्ञान निर्भर था। भग- हैं। यहींसे भारतीय दर्शनोंकी विचार-प्रणाली तर्कवान् महावीर स्वामीके निर्वाण कालसे लगा कर निर्धा- प्रधान बन जाती है और उत्तरोत्तर इसीका विकास रित आगम-काल तकका निर्मित साहित्य वर्तमान में होता चला जाता है। इतना पाया जाता है:-११ अंग, १२ उपांग, ५ छेद, सर्वप्रथम यह सोचना आवश्यक है कि महषि ५ मूल, ३० पयन्ना, १२ नियुक्तियाँ, तत्त्वार्थसूत्र जैसे गौतमने इस प्रणालीकी नींव क्यों डाली १ बात यह थी ग्रंथ एवं कुछेक ग्रंथ और भी मिलते हैं । इनके कि ब्राह्मणोंने स्वार्थवश-सत्ताके बल पर वैदिक-धर्म पर अतिरिक्त इस कालमें निर्मित अभ्य श्वे० ग्रंथों का पता एकाधिपत्य जमा लिया था. एवं धार्मिक-क्रिया-कर्मोमें नहीं चलता है।
इस प्रकारकी विकृति पैदा कर दी थी कि जिससे जन. विक्रमकी पांचवीं शताब्दिसे जैन साहित्य पल्लवित साधारणका शोषण होता था और उनके दुःखोंमें वृद्धि होने लगा और ज्यों-ज्यों समय बीतता गया त्यों त्यों होती जाती थी । इसलिये जनताका झुकाव तेज़ीसे जैनविकसित और प्रौड़ होता रहा है।
धर्म और बौद्धधर्मकी अोर होने लग गया था। क्योंकि भारतीय-तर्कशास्त्रकी प्रतिष्ठा इन दोनोंकी कार्य प्रणाली समान-वाद और मध्यममार्ग भारतीय तर्कशास्त्र के अादि प्रणेता महर्षि गौतम हैं पर अवलम्बित थी। ये जातिवादका (वर्ण-व्यवस्थाका) इन्होंने ही इस शास्त्रको व्यवस्थितरूप दिया । यद्यपि और यज्ञ श्रादि निरुपयोगी क्रिया काण्डोंका निषेध उनके पूर्व भी उपनिषदों आदि प्राचीन ग्रंथों में "अान्वी- करते थे, एवं यह प्रतिपादन करते थे कि सभी मनुष्य
* इसका दृष्टिकोण श्वेताम्बर साहित्य धाराकी समान हैं, सब के हित एक हैं, प्रत्येक व्यक्ति (चाहे वह अपेक्षासे है। लेखक
स्त्री हो या पुरुष ) धर्मका अाराधन कर मुक्ति प्राप्त कर