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________________ १७६ अनेकान्त जाता है। धर्माचरण, व्रताचरण, संयमाचरण, व्यवहार योग्य कुलाचरण, सद्व्यवहार सभ्य कुलाचरण आदि सब एक ही बात है। इन चरणों में अन्तर केवल इतना ही है कि कोई आचरण में तो धार्मिकता महारूप से है व कोई श्राचरण में गुरूपसे । इसी तरह पापाचरण असंयमाचरणा निंद्य कुलाचरण असभ्याचरण कुत्सित व्यवहार आदि भी सब एक ही बात है । इन श्राचरणों में भी अन्तर केवल इतना ही है कि कोई |[ मार्गशीर्ष, वीर निर्वाण सं० २४६६ आचरण में तो पाप महा रूपसे है व कोई श्राचरणमें अणुरूपसे । अब मैं लेखको समाप्त करके पूज्य बाबू सूरजभानजीसे प्रार्थना करता हूँ कि यदि लेखमें मुझसे कुछ अनुचित लिखा गया हो तो उसके लिये वे कृपाकर मुझ अल्पज्ञको क्षमा करें तथा मेरे ऊपर वात्सल्य भाव धारण करके किये गये प्रश्नोंका सम्यक् समाधान करके मुझे अनुगृहीत करें । अनुपम क्षमा क्षमा अंतः शत्रुको जीतनेमें खड्ग है; पवित्र प्रचारकी रक्षा करनेमें बस्तर है । शुद्ध भावसे असह्य दुःखमें सम परिणामसे क्षमा रखने वाला मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है । कृष्ण वासुदेवका गजसुकुमार नामका छोटा भाई महास्वरूपवान और सुकुमार था । वह केवल बारह वर्ष की वयमें भगवान् नेमिनाथके पास संसार त्यागी होकर स्मशानमें उम्र ध्यानमें अवस्थित था । उस समय उसने एक अद्भुत क्षमामय चारित्र से महासिद्धि प्राप्त की उसे मैं यहाँ कहता हूँ । सोमल नामके ब्राह्मणकी सुन्दर वर्ण संपन्न पुत्रीके साथ गजसुकुमारकी सगाई हुई थी । परन्तु विवाह होनेके पहले ही गजसुकुमार संसार त्याग कर चले गये । इस कारण अपनी पुत्रीके सुखके नाश होने के द्वेषसे सोमल ब्राह्मणको भयङ्कर क्रोध उत्पन्न हुआ । वह गजसुकुमारकी खोज करते-करते उस स्मशानमें श्र पहुँचा, जहाँ महामुनि गजसुकुमार एकाग्र विशुद्ध भावसे कायोत्सर्ग में लीन थे। सोमलने कोमल गजसुकुमारके सिरपर चिकनी मिट्टीकी बाड़ बनाकर इसके भीतर धधकते हुए अंगारे भरे और उसे ईंधनसे पर दिया । इस कारण गजसुकुमारको महाताप उत्पन्न हुआ । जब गजसुकुमारकी कोमलदेह जलने लगी, तब सोमल, वहाँ से चल दिया । उस समयके गजसुकुमारके असह्य दुःखका वर्णन कैसे हो सकता है । फिर भी गजसुकुमार सम्भाव परिणामसे रहे । उनके हृदय में कुछ भी क्रोध अथवा द्वेष उत्पन्न नहीं हुआ । उन्होंने अपनी आत्माको स्थिति स्थापक दशामें लाकर यह उपदेश दिया, कि देख यदि त ने इस ब्राह्मणकी पुत्री के साथ विवाह किया होता तो यह कन्या- दानमें तुझे पगड़ी देता । यह पगड़ी थोड़े दिनोंमें फट जाती और अन्त में दुःखदायक होती । किन्तु यह इसका बहुत बड़ा उपकार हुआ, कि इस पगड़ीके बदले इसने मोक्षकी पगड़ी बाँध दी। ऐसे विशुद्ध परिणामोंसे अडिग रहकर सम्भावसे असह्य वेदना सहकर गजसुकुमारने सर्वज्ञसर्वदर्शी होकर अनन्त जीवन सुखको पाया । कैसी अनुपम क्षमा और कैसा उसका सुन्दर परिणाम । तत्त्व ज्ञानियोंका कथन है कि आत्माओं को केवल अपने सद्भावमें आना चाहिये । और आत्मा अपने सद्भावमें आई कि मोक्ष हथेली में ही है ! गजसुकुमारकी प्रसिद्ध क्षमा कैसी शिक्षा देती है । - श्रीमद्रराजचन्द्र
SR No.527157
Book TitleAnekant 1939 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1939
Total Pages68
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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