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________________ वर्ष ३, किरण २] ऊँच-नीच-गोत्र-विषयक चर्चा पूर्णरूप वाले धर्माचरण व उनके अनुरूपधारी सदाचरण शब्द क्या उसकी सदोषताको दूर नहीं कर सकेगा। व सद्व्यवहार । अहिंसा सत्य-शील-संयमादि सद्व्यवहारों यदि उसमें सदोषता है तो 'उच्च र्गोत्रोदयादेरार्याः' के बिना आर्य मनुष्यके उच्चगोत्रका उदय नहीं है बल्कि इसका अर्थ, उच्च गोत्रोदयको आदि देकर अहिंसा नीचगोत्रका उदय है । इसी तरहसे म्लेच्छ मनुष्य होनेके सत्य शील संयमादि आचरणवाले प्रार्य हैं ऐसा करने लिये नीचगोत्रके उदयके साथ 'पादि' शब्दसे दूसरे पर तथा "नीचैर्गोत्रोदयादेश्च म्लेच्छाः", इसका कारण भी आवश्यक बतलाये हैं और वे दूसरे कारण अर्थ नीचगोत्रोदयको आदि लेकर हिंसा झूठ चोरीहैं, हिंसा-चोरी झूठ व्यभिचार प्रादि पापाचरण । हिंसा कुशीलादि पाचरणधारी म्लेच्छ हैं ऐसा करने पर क्या झुठ चोरी कुशील श्रादि पापाचरणोंके बिना म्लेच्छ फिर भी उक्त स्वरूप कथनमें सदोषता प्रतीत होगी? मनुष्यों के नीचगोत्रका उदय नहीं है, बल्कि अहिंसा मेरी अल्प बुद्धिमें उपर्युक्त विद्यानन्दस्वामीके स्वरूप सत्य शील संयमादिके पालनेके कारण उसके उच्चगोत्र कथनकी सदोषता समझमें नहीं पाई ।। का उदय है । आगे श्री अमृतचन्द्राचार्यका तत्वार्थसारका श्लोक आगे श्री विद्यानन्द स्वामीके इस आर्य म्लेच्छ लिखकर उसका अर्थ लिखा है कि "जो मनुष्य आर्यविषयक स्वरूप कथनको श्रीयुत पूज्य संपादकजी साहब खंडमें पैदा होवें सब आर्य हैं जो म्लेच्छ खंडोंमें उत्पन्न ने सदोष बतलाया है जिसे बादको पं० कैलाशचन्द्रजी 'श्रादि' शब्दका उक्त वाच्य मान लेने पर भी शास्त्रीने भी अपने लेखमें (किरण ३ पृ० २०७ ) सदोष लक्षणोंकी सदोषता दूर नहीं हो सकेगी; क्योंकि तब स्वीकार किया है । परन्तु उसमें आया हुआ 'आदि' जिन्हें क्षेत्रार्य, जात्यार्य तथा कार्य कहा जायगा रन ॐ आर्य और म्लेच्छ के लक्षणोंमें पड़े हुए 'श्रादि' सबमें उच्चगोत्रका उदय और अहिंसादिकका व्यवहार शब्दका जो वाच्य अहिंठा-सत्य-शील-संयमादि तथा बतलाना पड़ेगा और वह बतलाया नहीं जासकेगाहिंसा-झूठ-व्यभिचारादिक लेखक महाशयने प्रकट किया आर्यखण्ड के सब मनुष्याको क्षेत्रार्य होने के कारण उच्च न्लेख विद्यानन्दस्वामीने कहाँ किया ? गोत्री कहना होगा, मावद्य कर्म आर्योको इधर कार्यकी लोकवार्तिक में तो वह कहीं उपलब्ध होता नहीं । और दृष्टिसे यदि ार्य कहना होगा तो उधर हिंसादिक न यही कहीं उपलब्ध होता है कि अहिंसादिक व्यवहारोंके व्यवहारों के कारण 'म्लेच्छ' भी कहना होगा, यह विरोध बिना उच्चगोत्रका और हिंसादिक व्यवहारोंके बिना नीच ग्राएगा। साथ ही. प्रत्येक आर्यके लिये जब अहिंसा गोत्रका उदय नहीं बन सकता । लक्षणों में 'आदि' शब्दके दिक व्रतोंका अनुष्ठान अनिवार्य होगा तब आर्यखण्डका द्वारा जिन दूसरे प्रायः अप्रधान कारणोंका समावेश कोई भी अविरत सम्यग्दृष्टि आर्य नहीं कहला सकेगा किया गया है वे तो 'गोत्रोदय' से भिन्न हैं तब गोत्रका और चारित्रार्य तथा दर्शनार्यके भेद भी निरर्थक हो उदय उनपर अवलम्बित-उनके बिना न हो सकने जायेंगे. जिन्हें विद्यानन्दने आर्योंके भेदोंमें परिगणित वाला-कैसे कहा जा सकता है ? इसलिये यह विचार किया है । इस तरह बहुत कुछ विरोध उपस्थित होगा श्लोकवार्तिककी दृष्टिसे कुछ ठीक मालूम नहीं होता। तथा आर्य-म्लेच्छकी समस्या और भी अधिक जटिल -सम्पादक हो जायगी। -सम्पादक
SR No.527157
Book TitleAnekant 1939 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1939
Total Pages68
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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