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________________ यदि इस राशि को प्रतिशत के आधार पर निरूपित करें तब ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय कर्म वेदनीय मोहनीय राशि कुलद्रव्य8640 4320 3000 30720 में से प्रतिशत 28.125 14.063 9.765 3000 9.765 अन्तराय नाम गोत्र आयु 3000 9.765 2925 2925 2910 9.522 9.522 9.473 100.000 एक समयप्रबद्ध कर्म वर्गणाओं का इस प्रकार अष्ट कर्मों में विभाजन होने के पश्चात् प्रश्न उठता है कि प्रत्येक मूल कर्म की उत्तर प्रकृतियों में विभाजन कैसे होता है? यह पुनर्विभाजन प्रत्येक बद्धकर्म के लिये भावों पर निर्भर करता है माना, वेदनीय कर्म का द्रव्य इसकी दो उत्तर प्रकृति साता व असाता में जाना है, तब आचार्य बतलाते हैं कि उस समय इन दोनों प्रकार के वेदनीय कर्म की प्रकृति के बंध के योग्य भाव - शुभ या अशुभ जैसे भी थे, जो किसी एक समय में एक ही जाति के होंगे, उसी के अनुरूप प्रकृति बनकर इनका समस्त द्रव्य उसी उत्तर प्रकृति रूप में चला जाता है। यही पुनर्विभाजन सभी कर्मों में किंतु कुछ भिन्न-भिन्न प्रकार से घटित किया जा सकता है। जैसे नाम कर्म की 42 या 93 उत्तर प्रकृतियों में होता है। इस गणना से यह ज्ञात हो जाता है कि कि कार्माण वर्गणा के कितने प्रदेश (द्रव्य) किस कर्म में गये किन्तु उनकी प्रकृति कैसे बनी व बंधी, उनकी आंतरिक रचना अर्थात् Chemical structure या Resonatic structure ( रासायनिक संरचना या अनुनाद रचना) में कैसा व कैसे परिवर्तन होता है, यह अभी वैज्ञानिकों को ज्ञात नहीं और न ही ऐसी रचना का उल्लेख कहीं देखने में आया है। किन्तु यह निर्विवाद सत्य व तथ्य है कि उनकी भिन्न-भिन्न प्रकृति अर्थात गुण होने से, रासायनिक संरचना में अन्तर अवश्य आता है क्योंकि उसी समय विभिन्न प्रकृतियां पड़कर उनके प्रभाव में संरचना में अन्तर आता है। रसायन विज्ञान की दृष्टि से उनके Resonatic structure में अंतर अवश्य आता है जिसका सोदाहरण उल्लेख आगे किया जाने वाला है। इस तथ्य का सबसे रुचिकर पक्ष यह है कि प्रत्येक जीव अपने साथ अनन्तानन्त कार्माण वर्गणाओं से निर्मित कार्माण शरीर लेकर जब अगले भव में गमन करता है अर्थात् विग्रह गति के पश्चात् गर्भ में प्रवेश करता है, तब गर्भ में आते ही, उसकी विभिन्न कर्म प्रकृतियों के उदय के कारण, तथा अन्तर्मुहूर्त में अपनी पर्याप्ति पूर्ण कर व फिर अपनी शारीरिक रचना पूर्ण करने लगता है। वास्तव में, जो जीव जैसी कर्म प्रकृतियां लेकर आता है, उनके उदय में आने पर उनके प्रभाव को भोगने के लिये अगले भव की वैसी ही परिस्थितियां बनाता है व बनती है। इसी कारण समागम के पश्चात माता व पिता के 46 46 गुणसूत्रों में से 2323 उसी प्रकार के गुणसूत्र छंटकर परस्पर युग्मित होते हैं। शेष 23 23 अप्रभावी हो जाते हैं। युग्मित गुणसूत्रों में प्रत्येक का 1-1 गुणसूत्र लिङ्ग निर्धारित करने में उत्तरदायी है तथा दोनों के शेष 2222 गुणसूत्र परस्पर में संयुक्त होकर / बंधकर इस प्रकार से रचना बनाते हैं कि उनके अनुसार अर्हतु वचन 23 (1-2), 2011
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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