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________________ - अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 23, अंक - 1-2, जनवरी-जून 2011, 7-17 आधुनिक जीव विज्ञान से परे जैन जीव विज्ञान - प्रभात कुमार जैन* सारांश कर्मों की 8 प्रकृतियों एवं उनके बंध की प्रक्रिया को बताने के साथ ही एक समय में प्रबद्ध कर्मवर्गणाओं के 8 कर्मों में विभाजन की रुपरेखा बताई गई है। आत्मा के साथ जुड़े इन कर्मों के कारण ही व्यक्ति का व्यक्तित्व निर्धारित होता है। जीव के अपने-अपने कर्म के उदय से उसमें उपस्थित डीएनए की श्रृंखला में Nucleotide में भिन्न-भिन्न प्रकार के बंध होते हैं जो लाखों लाखों प्रकार के हैं, जिनसे प्रत्येक जीव के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं। किन्तु इन बंधनों को पुरुषार्थ से परिवर्तित भी किया जा सकता है। वैज्ञानिक इस कार्य में संलग्न हैं, सफलताएं मिल रही हैं और भविष्य में मिलेगी भी किन्तु बाधा अभी यह है कि कार्माण वर्गणा इतनी सूक्ष्म हैं कि उनका वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से भी देख पाना अभी सम्भव नहीं है। भविष्य के गर्भ में क्या दिया है? इसे जानना अभी कठिन सा है। इस प्रबंध में तीन स्थानों पर रासायनिक प्रतिक्रियाएं देकर यही सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि परमाणु में या उनसे बने यौगिकों में भिन्नभिन्न रचनाएं बनने या नये प्रकार के बॉन्ड बनने पर किस प्रकार से उनके गुणों में अंतर आ जाता है। इसी प्रकार से भावों से क्रियाओं से कार्माण वर्गणाओं में भी अंतर आता है जिससे औदारिक या वैक्रियिक शरीर की रचना, आकृति तथा संस्कारों में अंतर आ जाता है। लोक के मौलिक छह अवयवी द्रव्यों में एकमात्र चेतनत्व गुण से युक्त आत्मा (अप्पा, आदा), असंख्यात प्रदेशी, अमूर्तिक, शाश्वत द्रव्य है जो संसारी अवस्था में अर्थात् द्रव्यकर्म से युक्त कार्माण शरीर तथा सहयोगी तैजस शरीर से युक्त किसी औदारिक या वैक्रियिक शरीर के मुख्यतः आश्रित है। इस कार्माण शरीर का निर्माण अनन्तानन्त कार्माण वर्गणाओं से हुआ है (जो अनादि है) तथा जो किसी जीव के मन, वचन या / और काय के परिस्पंदन के कारण द्रव्यकर्म में परिणत हो चुकी हैं तथा समस्त, असंख्यात आत्मप्रदेशों के साथ अब एकक्षेत्रावगाही व समान रूप से बंधी हुई है। प्रश्न होता है कि इन कर्मों का बन्ध हुआ कैसे ? सामान्य सा उत्तर है कि कथंचित् अनन्तकालीन पूर्वबद्ध कर्मों के उदय से उत्पन्न भावकर्म और भावकर्म से प्रभावित/प्रेरित होकर अनन्त ज्ञेयों में रुचि या आकर्षण- विकर्षण अर्थात् राग, द्वेष, मोहादि के कारण । प्रत्येक समय किसी भी जीव के साथ कर्मों का आस्रव (आगमन) हो रहा है, उनकी संख्या कितनी है ? उनका विभिन्न अष्ट कर्म प्रकृतियों में विभाजन कैसे होता है? वे घातिया एवं अधातिया कर्मों में किस प्रकार से बंटते हैं तथा काल अथवा एक समय प्रबद्ध कर्मवर्गणाओं के विभाजन का गणितीय आधार क्या है ? * के.एच-93,एफ.एफ.-2,शान्ति निकेतन, कविनगर, गाजियाबाद (उ.प्र.) 210002
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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