SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 57
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गुप्त साम्राज्य मानना पड़ता है और इसी कारण उस काल की, भारत ही नहीं द्वीपस्थ भारत तक की, मूर्तिकला गुप्तकला कही जाती है।" मथुरा, राजगिर, विदिशा, नचना (सीरा पहाड़ी), उदयगिरि, कहौम, वाराणसी, अकोटा, चौसा तथा देवगढ़ आदि स्थानों से प्राप्त तीर्थंकर मूर्तियों से ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्तकाल में तीर्थंकर प्रतिमाओं के कई निर्माण केन्द्र थे । इसी काल की अनेक जैन प्रतिमायें ग्वालियर के पास किले, बूढ़ी चंदेरी आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं। उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट है कि गुप्तकाल में जैन मूर्तियों को उत्कीर्ण करने तथा उन्हें प्रतिष्ठापित करने का कार्य प्रचलित रहा। 1. संदर्भ सूची : तिवारी, मारुतिनंदन प्रसाद, जैन प्रतिमा विज्ञान, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, वाराणसी, 1981, पृ. 19, 20 तिवारी, मारुतिनंदन प्रसाद, वही जोशी, नीलकण्ठ पुरुषोत्तम, 'मथुरा', जैन कला एवं स्थापत्य (खण्ड-1), भारतीय ज्ञानपीठ, नईदिल्ली, 1957, q. 107-117 गुप्त साम्राज्य का इतिहास, पृ. 290 जैन, हीरालाल, भारतीय संस्कृति में जैनधर्म का योगदान, मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद, भोपाल, 1962, पृ. 346 अर्हतु वचन 23 (1-2), 2011 2. 3. पटना संग्रहालय में संग्रहीत चौसा नामक स्थान से मिली तीर्थंकर ऋषभनाथ की गुप्तकालीन, कांस्यमूर्ति 4. 5. 33 57
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy