________________
है कायोत्सर्ग मुद्रा में यह प्रतिमा मुकुट, कुण्डल, भुजबंध, कंगन और धोती से युक्त है। धोती के दो छोर मध्य में बँधे हुए लहरा रहे हैं । भुजबँध मणिमय स्वर्णमाल युक्त है, दायें कान में मोती का कुण्डल लटक रहा है और बायें में मकर कुण्डल प्रतीत होता है। त्रिकुट (त्रिकोणात्मक) मुकुट मध्य में बड़ी और दुहरे चूडामणि युक्त पर्त तथा दोनों ओर दो छोटी पर्तों से निर्मित है । ग्रीवा में मनोहर एकावली
नयनों में रंजित रजत, जो धूमिल पड़ चुकी है, विस्तृत स्कंधों युक्त देह, सुविकसित वक्षस्थल, कुछ-कुछ क्षीण कटि-प्रदेश, सुंदर मुख, किनारी पर मणिकाओं युक्त अण्डाकार प्रभामण्डल तथा अभिलेख की पुरालिपि के आधार पर हम इस कांस्य मूर्ति को लगभग छठी शती के मध्यकाल का मान सकते है।
चौसा - बिहार में आरा के समीप चौसा नामक स्थान से 6 गुप्तकालीन जिन मूर्तियाँ मिली हैं, जो सम्प्रति पटना संग्रहालय में हैं। ये सहज आकर्षण और अभिव्यक्ति की उपयुक्तता दर्शाती हैं। इनमें से दो आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभ की हैं जैसा कि उनके परिचय चिन्ह (अर्धचंद्र) से स्पष्ट है, जो शिरश्चक्र के ऊपर मध्य में दिखाया गया है। अन्य दो प्रतिमाएँ प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की हैं, जिनकी पहचान उनके कंधों तक आये बालों के कारण हो सकी है। शेष दो क्षीण हो जाने और इस कारण विवरणों का पता नहीं लग पाने से पहचानी नहीं जा सकी हैं। सभी तीर्थंकरों को पादपीठ पर ध्यान मुद्रा में आसीन अंकित किया गया है और सभी के वक्ष के मध्य में श्रीवत्स चिन्ह तथा पीछे की ओर शिरश्चक्र हैं । जिस मूर्ति का शिरश्चक्र अब लुप्त हो गया है, उसके पीछे की चूल से ज्ञात होता है कि वहाँ पहले शिरश्चक्र था। तीर्थंकर ऋषभदेव की दो प्रतिमाओं में से एक खडगासन मुद्रा में है। डॉ.बी.पी.सिंह ने इस प्रतिमा को बिहार से प्राप्त पाल कालीन प्रतिमाओं की कोटि में रखा है, किंतु अंगों की संरचना, केशविन्यास एवं प्रभामण्डल की शोभा के आधार पर यह प्रतिमा गुप्तकालीन प्रतीत होती है।31
देवगढ़ - देवगढ़ में मूर्तियों का निर्माण प्रचुरता से हुआ। उनकी संख्या और विविधता से प्रतीत होता है कि यहाँ बहुत बड़ा मूर्ति निर्माण केन्द्र था, गुप्तकाल की अनेक मूर्तियाँ यहाँ उपलब्ध हैं। मूर्तिकला की दृष्टि से देवगढ़ की अपनी स्वतंत्र शैली थी, जो गुप्तकाल में स्पष्टतर हो उठी।
देवगढ़ में अन्य मूर्तियों की अपेक्षा तीर्थंकरों की मूर्तियाँ कई गुना अधिक है । मुख्य रूप से आदिनाथ, पार्श्वनाथ, नेमिनाथ, महावीर और शांतिनाथ की मूर्तियां है । बहुसंख्यक मूर्तियों पर लांछन नहीं मिलता है। प्रायः सभी शिलपट्टों पर उत्कीर्ण की गई है। द्वि-मूर्तिकायें, त्रिमूर्तिकायें, सर्वतोभाद्रिकायें और चतुर्विंशतिपट्ट प्रचुरता से उपलब्ध है। द्वारों पर भी तीर्थंकर मूर्तियों का अंकन हुआ है। प्रायः सभी मूर्तियों के साथ भिन्न-भिन्न रूप से कुछ परम्पराओं का निर्वाह किया गया है । गुप्तकाल तक आते-आते देवगढ़ का कलाकार मूर्तियों में सजीवता और भावना का संचार करने में पूर्ण सफल हो जाता है । यद्यपि अलंकरण की सादगी बनी रही, यूनानी प्रभाव लुप्त होकर भारतीय आकृति पूर्ण रूप से सामने आ जाती
गुप्तों का कलाप्रेम और उत्कृष्ट रुचि उनके युग की प्रत्येक कृति से टपकती है। गुप्तकालीन कला का उत्कर्ष गुप्त-साम्राज्य के निःशेष हो जाने पर भी लगभग सौ वर्ष तक बना रहा । अर्थात् जहाँ तक कला का संबंध है, 320 ई. से 600 ई. तक गुप्तकाल गिना जाता है । यद्यपि गुप्त मूर्तिकला वाकाटक मूर्तिकला की ही परम्परा है, किंतु गुप्त इतने सुसंस्कृत थे और उनकी कलाभिरुचि इतनी सक्रिय थी कि उस काल की समूचि कला कृति पर चाहे वह गुप्त-साम्राज्य में रही हो चाहे वाकाटक-साम्राज्य में,
56
अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011