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आये है। 12
इन उत्कीर्ण लेखों में महाराजाधिराज रामगुप्त का उल्लेख है। लेखों की लिपि प्रारंभिक गुप्तकालीन है। श्री कृष्णदत्त बाजपेयी का भी कहना है कि प्रतिमा लेख चौथी शती ई. के हैं, क्योंकि उनकी लिपि चन्द्रगुप्त द्वितीय के साँची और उदयगिरि के गुहालेखों से मिलती है। प्रतिमाओं की कला शैली के संबंध में उनके विचार है कि इन प्रतिमाओं में कुषाण कालीन तथा पाँचवी शती ई. की गुप्तकालीन मूर्ति कला के बीच के लक्षण दृष्टिगत होते है । 13 लिपि, मूर्तियों की निर्माण शैली तथा 'महाराजाधिराज' उपाधि के साथ रामगुप्त के नामोल्लेख से मूर्तियों का चौथी शती ई. के अंतिम चतुर्थांश में निर्मित होना प्रमाणित हुआ। दो पीठिका लेखों में तीर्थकरों का नाम चन्द्रप्रभ तथा तीसरे में पुष्पदंत दिया है। 14
अभिलेख पद्मासनस्थ ध्यानमुद्रा में तीर्थकर प्रतिमाओं के पादपीठ पर अंकित है। पादपीठों के दोनों ओर पंखधारी सिंह तथा मध्य में धर्मचक्र उत्कीर्ण है, जिसकी परिधि का अंकन सामने की ओर है । इनमें से दो प्रतिमाओं की मुखाकृतियाँ विखण्डित हो चुकी है, किंतु उनके पीछे भामण्डल तथा पार्श्व में दोनों ओर चमरधारी पुरुष खड़े हैं। इन भामण्डलों की बाहरी परिधि नखाकार किनारी से अलंकृत है तथा केंद्र में एक सुंदर खिला हुआ बहुदल कमल है। तीसरी मूर्ति का प्रभामण्डल अधिकांशतः नष्ट हो गया है और यह भी निश्चित नहीं है कि इस मूर्ति के पार्श्व में खड़े हुए सेवक अंकित थे या नहीं। किंतु तीर्थंकर की मुस्कानयुक्त मुखाकृति का एक अंश मात्र शेष है। नासिका, नेत्र और ललाट भाग खण्डित हो चुके है। शीर्ष के शेष भाग में कानों के लम्बे छिद्रयुक्त पिण्ड दिखाई देते है । इन तीनों प्रतिमाओं के वक्षस्थलों पर 'श्रीवत्स' चिन्ह स्पष्टः परिलक्षित है । प्रत्येक तीर्थंकर का धड़ एक पूर्ण विकसित एवं सुस्पष्ट वक्ष स्थलयुक्त है जो गुप्तकालीन मूर्तिकला की अपनी विशेषता है । धड़ दोनों ओर निकली हुई कोहनी और भुजाओं की स्थिति विशेष प्रकार की है, जो समूची प्रतिमा को एक त्रिकोणाकार रूप प्रदान करती है, जिसके सिर त्रिकोण का शीर्षभाग और दोनों भुजाएँ त्रिकोण की दो भुजाओं का रूप ग्रहण करती प्रतीत होती है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि इस काल में और कम से कम जैन ध्यानावस्थित प्रतिमाओं में पद्मासन मुद्रा का अंकन योगासन की एक आदर्श मुद्रा के रूप में मान्य रहा होगा । ये मूर्तियाँ मात्र जैन धर्म के इतिहास तथा मूर्तिकला की दृष्टि से ही नहीं अपितु गुप्तकालीन कला के इतिहास की दृष्टि से भी विशेष महत्वपूर्ण है । 15
विदिशा के निकट उदयगिरि की एक गुफा ( गुफा 20 ) में गुप्त संवत् 106 (425-26 शती ई.) कुमारगुप्त - प्रथम का शासनकाल का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है जिसमें पार्श्वनाथ की एक प्रतिमा के निर्माण का उल्लेख है जो उनके सिर पर भयंकर नाग-फण के कारण भयमिश्रित पूज्य भाव को प्रेरित करती है। उक्त शिल्पांकित मूर्ति अब नष्टप्राय समझी जाती है। जो मूर्ति इस समय गुफा में स्थित है, वह बहुत परवर्ती काल की है। तथापि, इस शिलालेख से यह पर्याप्त स्पष्ट नहीं है कि पार्श्वनाथ की प्रतिमा इस गुफा में एक पृथक प्रतिमा थी, क्योंकि शिलालेख में 'अचीकरत्' शब्द का उपयोग हुआ है । जिसका अर्थ है 'निर्माण करवाया गया' उत्कीर्ण करने या मूर्ति को प्रतिष्ठापित करने का भाव इसमें नहीं है । संभव है शिलालेख के आंशिक रूप से खंडित हो चुकी पार्श्वनाथ की उस वर्तमान प्रतिमा का संदर्भ हो जो गुफा की मिति पर उत्कीर्ण है।
विदिशा के निकट बेसनगर से भी तीर्थंकर की उत्तर गुप्तकालीन प्रतिमा प्राप्त हुई है। यह गुप्तकाल की उत्कृष्ट कलाकृति है । इसकी अवगाहना साढ़े छह फुट है। यह ग्वालियर संग्रहालय में सुरक्षित है।'
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अर्हतु वचन 23 (1-2), 2011
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