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है, जिसमें सिंहासन पर पार्श्वनाथ सिंहों के मध्य मीन युगल दिखाया गया है। जिनके मुख खुले हुए हैं और उनसे सूत्र लटक रहा है । आगे चलकर मीन अठारहवें तीर्थंकर अरनाथ का चिन्ह पाया जाता है। अतः यह प्रतिमा अरनाथ की है। एक खण्डित मूर्ति में दाहिनी ओर की वनमाला तथा सर्पफणों एवं हल से युक्त बलराम की मूर्ति के आधार पर जिन की पहचान नेमिनाथ से की गई है । एक दूसरी नेमि मूर्ति में भी बलराम एवं कृष्ण आमूर्तित हैं । १०
राजगिर - राजगिर (बिहार) के पर्वत पर ध्वस्त जैन मंदिरों के अवशेष मिले हैं , जिसमें लगभग चौथी शती ई. की चार जिन मूर्तियाँ मिली है। जिनमें एक वैभार पहाड़ी के ध्वस्त मंदिर से प्राप्त बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ की प्रतिमा है । काले पत्थर की इस प्रतिमा पर एक अस्पष्ट शिलालेख पाया गया है जिसमें गुप्त लिपि में (महाराजाधिराज) श्री चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमा दित्य) के नाम का उल्लेख है। इस तीर्थंकर प्रतिमा का शीर्ष टूट गया है अन्यथा यह प्रतिमा गुप्त कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। तीर्थंकर मूर्ति को सिंहासन पर ध्यानमुद्रा में अंकित किया गया है। सिंहासन के अंतिम सिरों पर उग्र सिंहों का अंकन किया गया है और एक अण्डाकार आरे युक्त चक्र की परिधि में एक राजपुरुष को खड़ा हुआ दिखाया गया है उसके दोनों ओर दो केशहीन तीर्थंकर मूतियाँ ध्यान मुद्रा में उत्कीर्ण हैं । एक अन्य राजगिर के तृतीय पर्वत पर एक फण युक्त पार्श्वनाथ की प्रतिमा प्राप्त हुई है। इस प्रतिमा का सिंहासन एवं मुख निर्माण सर्वथा गुप्त कला के अनुरूप है।
इन मूर्तियों की शैलीगत विशेषताएँ उन शैलियों को प्रदर्शित करती हैं जो सारनाथ तथा देवगढ़ में साकार हुई और जिन्होंने पूर्वी –भारत में मूर्ति निर्माण गतिविधि को प्रभावित किया । राजगिर की जैन कला में कम से कम दो पृथक शैलीगत वर्ग स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं। पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व वैभारगिरि के ध्वस्त मंदिर से प्राप्त नेमिनाथ की प्रतिमा और पूर्वी सोनभण्डार गुफा की छह अन्य तीर्थंकर शिल्पाकृतियाँ करती हैं। इनमें दूसरे वर्ग की अपेक्षा इनमें अधिक लालित्य है एवं शरीर रचना में अंगों का पारस्परिक संबंध अधिक अच्छी तरह दिखाया जा सका है। दूसरे वर्ग में तीन प्रतिमाएँ आती हैं जो ध्वस्त मंदिर की उसी कोठरी में नेमिनाथ की प्रतिमा के साथ ही प्राप्त हुई थी। इस वर्ग की प्रतिमाओं की विशेषताएं हैं - अपेक्षाकृत सुगठित धड़, स्तंभ-जैसे पैर और नाभि के नीचे सुस्पष्ट मांस-पिण्ड जिसके नीचे एक गहरी उत्कीर्ण रेखा है जो आकृति को स्पष्ट काटती है। यह बात गर्दन में भी देखने को मिलती है। दोनों ही वर्गों की तीर्थकर प्रतिमाओं के हाथों का अंकन भी इस दृष्टि से असंगत है कि सामने की भुजाएँ पार्श्व हाथों से जोड़ी गयी हैं, साथ ही दोनों वर्गों में स्तंभ जैसे पैर हैं तथा टांगों के अंकन में शीघ्रता से काम किया गया है । इस प्रकार ये प्रतिमाएं एक नयी शैली की सूचना देती हैं जो उस समय अपना स्थान बनाती जा रही थी। मिश्रित अंकन के अतिरिक्त इन प्रतिमाओं पर तीर्थकरों के वे परिचय चिन्ह भी अंकित हैं जो प्रतिमा विज्ञान में स्वीकार किए जा रहे थे तथा जिनसे विभिन्न तीर्थंकरों की पहचान करने में सहायता मिलती है।
विदिशा - मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में 'हेलियोडोरस' के प्रसिद्ध अभिलेख वाला 'गरुड़स्तम्भ' जहाँ से प्राप्त हुआ, उस बेसनगर के केवल तीन किलोमीटर की दूरी पर, 'दुर्जनपुर' गाँव में, खेती के लिये बुलडोजर से जमीन तोड़ते समय तीन मूर्तियां प्राप्त हुई थी। बुलडोजर के कठोर आघातों से इन तीनों मूर्तियों को विशेषकर उनके मुख भागों को तथा पार्श्व भागों को, भारी हानि पहुंची है। इन तीनों मूर्तियों पर उकेरे हुए तीनों अभिलेख बहुत संतोषजनक स्थिति में नहीं थे, परंतु गहन परीक्षण पर वे गुप्त राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालने वाले अत्यधिक महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में सामने
अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011
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