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________________ प्रभामण्डल है, दांये बांये चांवरधारी हैं। पीठिका का चिन्ह स्पष्ट है एवं अन्य तीर्थकर (70x40x15 सें.मी.) प्रतिमा कायोत्सर्ग मुद्रा में है। वितान पर तीर्थकर के ऊपर छत्र जिसके दोनों ओर मालाधारी युग्म हैं । नीचे चंवरधारी हैं। आशापुरी- आशापुरी गोहरगंज तहसील में गोहरगंज से उत्तर-पश्चिम में करीब 7 कि.मी. दूरी पर हे। यह 22°05' उत्तरी अक्षांस एवं 77°40' पूर्वी देशान्तर पर अवस्थित है। आशापुरी से जैन मंदिर के अवशेष सतमसिया से मिले है । परमार कालीन मंदिर स्थापत्य की यह एक-एक अनुपम कृति रही होगी। इसके गर्भगृह के चारों ओर बाह्य दीवारों पर स्तम्भों पर जैन शासन देवताओं यक्षिणियों की प्रतिमाएं बनी थी। इनमें चक्रेश्वरी, गोमेघ-अम्बिका की प्रतिमा महत्वपूर्ण है । इसके अतिरिक्त जैन प्रतिमाएं जैन चतुष्टिका आदि भी प्राप्त हुई हैं। इस मंदिर के प्रांगण में महाकाथिक तीर्थंकर प्रतिमा स्थापित रही होगी, जिसे सम्प्रति मंदिर के अवशेषों के समीप ही देखा जा सकता है। आशापुरी से तीर्थंकर आदिनाथ की कायोत्सर्ग मुद्रा में पांच प्रतिमाएं एक आदिनाथ की पद्मासन प्रतिमा चतुष्टिका जिसके चारों ओर पद्मासन में तीर्थंकर पार्श्वनाथ अंकित है। यक्षी चक्रेश्वरी प्रतिमा, यक्ष-यक्षी गोमेदअम्बिका, यक्षी अम्बिका प्रतिमा आदि उल्लेखनीय हैं। सिलवानी - सिलवानी इसी नाम की तहसील का मुख्यालय है। जो रायसेन से 100 कि.मी. उत्तर पूर्व में स्थित है। यह 23°18' उत्तरी अक्षांस एवं 78°29' पूर्वी देशान्तर पर अवस्थित है। इस गांव के मध्य में लगभग 15वीं शती ईस्वी में निर्मित जैन मंदिर है। इसमें पार्श्वनाथ, बाहुबली एवं महावीर स्वामी की प्रतिमा स्थापित हैं। यहां स्थित जैन मंदिर एक जगति पर बना है जो अर्द्ध पत्तीनुमा कंगूरों से अलंकृत है। दरवाजे के सामने दालान है जो दोनों ओर चार-चार स्तम्भों पर आधारित है। ऊपर गजपृष्ठाकृत शिखर है, जिसके तीन दरवाजे मेहरावदार हैं, मंदिर में दो गर्भगृह है, जो जंघा गुम्बदाकार शिखर आमलक एवं कलश से अलंकृत हैं। मंदिर में तीर्थंकर पार्श्वनाथ कायोत्सर्ग मुद्रा में अंकित हैं, तीर्थकर के सिर पर कुन्तलित केश, लम्बे कर्ण चाप, वक्ष पर श्रीवत्स सिर के ऊपर ग्यारह फण की नाग मौलि है । पार्श्व में परिचारक खड़े हैं । लगभग 15वीं शती ईस्वी की प्रतिमा काले पत्थर पर निर्मित है। सामान्यतः ग्यारह फण नाग मौलि युक्त प्रतिमा नहीं मिलती है इस कारण यह प्रतिमा प्रतिमा विज्ञान की दृष्टि से दुर्लभ है । ग्यारह नागफण युक्त प्रतिमा का उल्लेख डॉ. मारुति नन्दन प्रसाद तिवारी ने जैन प्रतिमा विज्ञान में एवं बी.सी. भट्टाचार्य ने दि. जैन आईकनोग्राफी में वर्णन किया है। अतः यह प्रतिमा विशेष महत्वपूर्ण है। यहां से प्राप्त तीर्थकर आदिनाथ के पुत्र बाहुबली की प्रतिमा कायोत्सर्ग मुद्रा में है, सिर पर कुन्तलित केश, लम्बे कर्णचाप हैं। हाथ एवं जंघाओं पर बेल (द्राक्षा बल्लरी) उनके चरणों ओर भुजाओं का आलिंगन कर रही हैं। बाहुबली में दांये बांये कायोत्सर्ग मुद्रा में तीर्थंकर प्रतिमायें हैं। सफेद बलुआ पत्थर पर निर्मित प्रतिमा लगभग मध्यकालीन प्रतीत होती है। मंदिर की एक वेदी पर सफेद पत्थर पर निर्मित तीर्थकर महावीर की प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। पद्मासन की ध्यानस्थ मुद्रा में तीर्थंकर के सिर पर कुन्तलित केश, लम्बे कर्णचाप वक्ष पर श्रीवत्स का अंकन है, नीचे पादपीठ पर ध्वज लाछन सिंह का अंकन है। प्रतिमा मध्यकालीन प्रतीत होती है। रायसेन जिले के उपरोक्त पुरातत्वीय एवं ऐतिहासिक स्थलों से प्राप्त जैन पुरावशेष स्थापत्य एवं मूर्ति कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, प्रस्तुत आलेख में जैन पुरावशेषों का सूचना मात्र विवरण है। उक्त स्थलों का विस्तार से अध्ययन किया जाय तो जैन पुरातत्व पर महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ सकता है। प्राप्तः 31.12.09 अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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