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________________ दसवीं सदी के आचार्य देवसेन (गणि) ने निम्नांकित 6 ग्रंथों का सृजन किया है : 1. दर्शनसागर 2. भावसंग्रह 3. आलाप पद्धति 4. लघु नयचक्र 5. आराधनासार 6. तत्त्वसार डॉ. नेमिचंद्र शास्त्री ने विस्तृत उहा-पोह के उपरांत आपका सरस्वती आराधना काल 933953 ई. निर्धारित किया है एवं आपको आचार्य विमलसेन गणि का शिष्य देवसेन बताया है । अन्य कृतियों से आपका नाम देवसेन गणि भी प्रतीत होता है । अपभ्रंश भाषा की कृति 'सुलोचना चरिउ' का श्रेय भी देवसेन को ही दिया जाता है, किन्तु वे देवसेन 'तत्त्वसार' के कर्ता देवसेन से भिन्न व्यक्ति प्रतीत होते हैं। उनका जीवनकाल वि.सं. 1132 (1076 ई.) मानना अधिक युक्तिसंगत है। आचार्य विशुद्ध सागरजी एवं उनकी कृति तत्त्वदेशना : 18.12.71 को रूर (भिण्ड) में जन्में श्री राजेन्द्र ही 21.11.91 को आचार्य श्री विरागसागरजी से दीक्षा लेकर मुनि विशुद्धसागर बने। आपका आचार्य पदारोहण औरंगाबाद में दिनांक 31.03.2007 को होना हम सबके लिये गौरवपूर्ण है। आपकी अब तक निम्नांकित 26 कृतियां प्रकाश में आयी है। शुद्धात्म तरंगिणी निजानुभव तरंगिणी निजात्म तरंगिणी पंचशील सिद्धांत आत्म बोध प्रेक्षा देशना (वारसाणुवेक्खा) पुरुषार्थ देशना तत्त्व देशना अध्यात्म देशना इष्टोपदेश भाष्य बोधि संचय समाधितंत्र अनुशीलन स्वरूप संबोधन परिशीलन सर्वोदयी देशना (इष्टोपदेश) स्वानुभव तरंगिणी श्रमण धर्म देशना अर्हत् सूत्र अमृत बिन्दु शुद्धात्म काव्यांजली 20-23. समय देशना भाग 1, 2, 3, 4 24. स्वरूप देशना 25. देशना बिन्दु 26. आत्माराधना संभव है कि विगत 1-2 वर्षों में कुछ नई कृतियां भी प्रकाशित हो गई हों । अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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