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________________ अर्हत वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 23, अंक - 1-2, जनवरी-जून 2011, 25-30 तत्त्वदेशना में भेद ज्ञान और उसका फल - अनुपम जैन* सारांश आचार्य देवसेन 11वी श.ई. के महान दि. जैन आचार्य है। तत्त्वसार उनकी एक प्रमुख कृति है। वर्तमान दशक के बहुश्रुत आचार्य श्री विशुद्धसागरजी द्वारा उनकी इस कृति को केन्द्र में रखकर दिये गये 49 प्रवचनों को संकलित कर प्रकाशित की गई कृति का नाम है तत्त्वदेशना । प्रस्तुत आलेख में इस कृति में आगत भेदज्ञान विषयक संदर्भो को संकलित एवं विवेचित किया गया है। सम्पूर्ण जैन वाङ्गमय को विषयानुसार विभाजन के क्रम में निम्नवत् चार अनुयोगों में विभाजित किया गया है। 1. प्रथमानुयोग - तीर्थंकर आदि 63 शलाकापुरुषों का जीवन, पूर्व भव एवं कथा-साहित्य । 2. करणानुयोग - भूगोल, खगोल, गणित एवं कर्म-सिद्धांत । 3. चरणानुयोग - श्रावकों एवं मुनियों की जीवनचर्या, विधि-निषेध । 4. द्रव्यानुयोग - आत्मा, परमात्मा 6 द्रव्य एवं 7 तत्त्व से सम्बद्ध आध्यात्मिक साहित्य । पूर्वाचार्यों ने अध्यात्म विषयक ग्रंथों की जटिलता एवं इन्हें सम्यक् रूप से आत्मसात करने के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि के सृजन की दृष्टि से चारों अनुयोगों के स्वाध्याय का एक क्रम निर्धारित किया है, जिसके अनुसार प्रथम तीन अनुयोगों का अपेक्षित ज्ञान प्राप्त कर लेने के उपरांत द्रव्यानुयोग के ग्रंथों का स्वाध्याय करने पर ग्रंथ रचनाकार के मनोगत भाव एवं आशय को हम ठीक से हृदयंगम कर पाते हैं । जिस प्रकार पूर्ववर्ती कक्षाओं के विषय का ज्ञान न होने पर छात्र उत्तरवर्ती कक्षाओं का विषय नहीं समझ पाता है, उसी प्रकार प्रथमानुयोग में वर्णित महापुरुषों के जीवनप्रसंगों, करणानुयोग में विवेचित लोक के स्वरूप, स्वर्ग-नरक की व्यवस्थाओं एवं कर्म-सिद्धांत की वैज्ञानिकता एवं सूक्ष्मता के जाने बगैर मानव-जीवन से सम्बद्ध विविध विषयों पर आस्था नहीं बनती। फलस्वरूप अध्यात्म के विवेचनों में भी हम तर्क के बजाय कुतर्क करने लगते हैं । पाप-पुण्य, निमित्त-उपादान, निश्चय-व्यवहार, हेयउपादेय एवं स्व-पर के भेद विज्ञान को जानने पर ही आध्यात्मिक विषयों को उनके सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। तब ही पूर्वाचार्यों के मंतव्य को हम आत्मसात कर सकते हैं। विक्रम की प्रथम शताब्दी के महान दिगम्बर जैनाचार्य कुन्दकुन्द की कृतियाँ समयसार, प्रवचनसार, नियमसार एवं पंचास्तिकाय अध्यात्म के सिरमौर ग्रंथ हैं । इनमें आत्मा को परमात्मा बनाने का श्रेष्ठ ज्ञान अपने उत्कृष्ठ रूप में निहित है, किन्तु इस ज्ञान को और अधिक स्पष्ट रूप से व्याख्यायित करने के लिये इन ग्रंथों पर टीकाओं तथा स्वतंत्र ग्रंथों का सृजन परवर्ती आचार्यों द्वारा किया गया। आत्मकल्याण की उत्कृष्ट भावना से अनुप्राणित होकर तिल-तुष मात्र का परिग्रह छोड़ने वाले शांतपरिणामी जैनाचार्यों की गहन अभिरुचि सदैव से अध्यात्म के ग्रंथों में रही है। आचार्य देवसेन एवं उनकी कृतियाँ : * प्राध्यापक - गणित, मानद सचिव-कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ,584,महात्मा गाँधी मार्ग, तुकोगंज, इन्दौर-452001
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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