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आक्रोश स्वयमेव कम हो जाता है। इसे ही जैन दर्शन अनेकांत कहता है । क्या हमने कभी विरोधी पक्ष को समझने का प्रयास किया है।
जो व्यक्ति काल स्वरूप साँप को नहीं मारने की वीरता रखता है वही अत्याचार होने पर अहिंसक सत्याग्रह कर सकता है । जरा-जरा सी बातों पर झगड़ने वाले हम लोग तो हिंसा को सहारा ही देते रहते हैं।
व्यक्ति से ही समष्टि का सुधार संभव है यह जैन धर्म की मूल अवधारणा है। आतंकवाद या अलगाववाद हिंसा की ऐसी शक्तियां हैं जिनके विरुद्ध संसार की समस्त सत्ताधारी शक्तियाँ कई गुनी शक्तिशाली हैं। परंतु हिंसा कभी किसी समस्या को मिटा नहीं सकती यह हम जितनी जल्दी समझ जायें उतनी जल्दी विश्वशांति की स्थायी व्यवस्था बनने लगेगी। दुनिया को सुधारने के लिये हमें शुरुआत स्वयं से करनी होगी।
बिन लादेन और बराक ओबामा को समझने से पहले हमें एक दूसरे के संबंधों एवं विचारों को समझना होगा। अलगाववाद को कोसने के पहले पारिवारिक सामाजिक बिखराव की विवेचना करनी होगी।
विचारों में अनेकांत होने पर वाणी में स्याद्वाद और आचरण में अहिंसा आती है और विचारों में अनेकांत अर्थात प्रतिपक्षी के प्रति माध्यस्थ भाव जैन कर्म सिद्धांत को जानने और मानने से सहजता में आ जाता है।
हिंसा का मूल क्रोध है । प्रतिपक्षी के प्रति क्रोध आना कषाय है और इसका लगातार बना रहना पाप के बंध का कारण है अतः सच्चा जैन अपनी गलती नहीं होने पर भी अपनी गलती मानकर क्षमा भाव धारण करता है और इस तरह से हिंसा से बच जाता है। क्योंकि वह जानता है कि अगर इस समय मेरी गलती नहीं भी दिख रही है तो अवश्य ही इसमें मेरे पूर्व जन्म के कर्मों का दोष है और इस तरह से वह समता का भाव बनाता है।
महात्मा गांधी कहते है 'शुद्धमन से सहन किया गया सच्चा दुख, पत्थर जैसे हृदय को भी पिघला देता है। इस दुःख सहन की अथवा तपस्या की ऐसी ही ताकत है और यही सत्याग्रह का रहस्य है।
अगर हम भी महात्मा गाँधी की भांति जैनधर्म के अनुसार आत्मा की अनंत शक्तियों को समझें और माने तो ना केवल हम अपने व्यक्तिगत जीवन को सुखी बना सकते हैं, बल्कि विश्वव्यापी समस्याओं को दूर करके विश्वशांति में अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं।
जैव विविधता एवं शाकाहार अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष 2010 में एक और सुन्दर संयोग बना। अक्टूबर 2010 में जापान के नगोया शहर में 170 देशों के प्रतिनिधि एकत्रित हुए । दुनियाभर के वैज्ञानिक पर्यावरण विनाश, ग्लोबल वार्मिंग, प्रजाति विलुप्तीकरण इत्यादि से आज अत्यधिक चिंतित हैं ।
पूरा पर्यावरण विज्ञान जैन धर्म के घोष वाक्य परस्परोग्रहो जीवानाम् तथा जियो और जीने दो के आसपास ही घूमता है। भारत सरकार के पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश कहते है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने के लिये गो मॉस (बीफ) खाना रोकना होगा (श्री रमेश शुद्ध शाकाहारी है)। वर्ष 2008 में संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन में पाया गया था कि विश्व में ग्रीन हाउस गैसों का लगभग पांचवां भाग मांस उत्पादन से होता है।
वस्तुतः अहिंसक आहार शाकाहार के द्वारा विश्व की विभिन्न समस्याओं खाद्यान्न समस्या, जल समस्या, अपराध, रोगों को समूल नष्ट किया जा सकता है जिसके पक्ष में प्रचुर वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध
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अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011