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की शक्ति मुझमें न हो ऐसा मानते हैं । श्रीमद् राजचन्द्र जी उत्तर देते हुए लिखते हैं कि इस असारभूत देह के रक्षण के लिये जिसे देह में प्रीत हो ऐसे सर्प को मारना आपके लिए कैसे योग्य है। जिसे आत्महित की इच्छा हो उसे तो वहाँ अपनी देह छोड़ देना ही योग्य है। .... अनार्यवृत्ति हो तो मारने का उपदेश किया जा सकता है । वह तो हमें, तुम्हें स्वप्न में भी न हो यही इच्छा करने योग्य है ।'2
आज सम्पूर्ण विश्व महात्मा गांधी और उनकी अहिंसा को आदर्श मानती है जबकि महात्मागांधी के जीवन एवं विचारों से उन पर जैनधर्म का प्रभाव स्पष्टतया परिलक्षित होता है।
महावीर से महात्मा तक एवं महात्मा से अब तक और आगे जैनधर्म और अहिंसा ने विश्व शांति में अनन्य योगदान दिया है। इतिहास से लेकर विज्ञान तक के सर्वमान्य तथ्यों के आधार पर अपने विचारों को सबके सामने रखना सबसे श्रेयस्कर है। विचार ही तो आखिर कार्यरूप परिणित होते हैं जैसा कि डायर ने कहा भी है- 'हम ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के द्वारा हर उस वस्तु को प्राप्त कर सकते हैं जिसकी इच्छा हम करते हैं क्योंकि जिसकी इच्छा हम करते हैं वह हमारे भीतर ही होता है और इसका उलट भी सत्य है।'
हिंसा का इतिहास और अहिंसक विश्व विजय विश्व इतिहास पर हमारी जहां तक नजर जाती है वहाँ तक हिंसा-प्रतिहिंसा का क्रूर कुचक्र दृष्टिगत होता है। महावीर स्वामी के समय हिंसा अपने चरम पर थी। कमजोरों, पशुओं और महिलाओं पर अत्याचार हो रहे थे। धर्म के नाम पर पाखंड फैला हुआ था। ऐसे समय में महावीर ने तपस्या से ज्ञान प्राप्त किया एवं उस केवलज्ञान से धधकती धरती को शांत किया। जैनधर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर ने हिंसा को किसी भी रूप में किसी भी प्रयोजन में पूर्णतः त्याज्य बताया। महावीर के प्रभाव से सैकड़ों वर्षों तक अहिंसा तथा शांति का वर्चस्व बना रहा परंतु एक बार फिर हिंसा का दौर शुरु हुआ तो अहिंसा धर्मग्रंथों, आराधना स्थलों तथा चन्द लोगों तक सिमट कर रह गयी।
सैकड़ों वर्षों तक मुस्लिम शासकों ने पूरे विश्व में धर्म के नाम पर खून की नदियां बहाई तो फिर व्यापारिक कुटिलता के द्वारा अंग्रेजों ने अधिकांश देशों को अपना गुलाम बना लिया। विश्व की सर्वशक्तिमान शक्ति के खिलाफ अचानक एक आत्मा ने अहिंसा का अचूक अस्त्र सत्याग्रह रखा।
इस सत्याग्रह ने मोहन को महात्मा बना दिया। गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह केवल आत्मा का बल है इसलिये जहां और जितने अंश में शस्त्र बल अर्थात शरीर बल अथवा पशु बल का प्रयोग हो सकता हो अथवा उसकी कल्पना की जा सकती हो वहाँ और उतने अंश में आत्म बल का प्रयोग कम हो जाता
स्पष्ट रूप से सत्याग्रह की इस अवधारणा पर जैन धर्म की आत्मा और अहिंसा के दर्शन का प्रभाव था। गांधीजी ने एक बार नहीं 16 बार विविध उद्देश्यों के लिये सत्याग्रह करके उसकी शक्ति को निरूपित किया गया है।
सत्य और अहिंसा का राजनीति में क्रांतिकारी प्रयोग करके महात्मा गांधी ने वस्तुतः जैनत्व को ही अभिनव ऊँचाई दी है। जैन धर्म कहता है कि जब तक वह धर्म मन में अतिशय निवास करता है तब तक प्राणी अपने मारने वाले का भी घात नहीं करता है । सत्याग्रह के संबंध में बापू कहते हैं -
'इसमें प्रत्यक्ष गुण या प्रकट अथवा मनसा, वाचा या कर्मणा किसी भी प्रकार की हिंसा की गुंजाइश नहीं है। विरोधी का बुरा चाहना या उसका दिल दुखाने के इरादे से उसे या उसके प्रति कठोर वचन कहना सत्याग्रह की मर्यादा का उल्लंघन है।'5
अपने समकालीन हिंसा और क्रूरता के प्रतिमान एडोल्फ हिटलर को अहिंसा के अवतार महात्मा
अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011