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________________ ____ अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 23, अंक - 1-2, जनवरी-जून 2011, 19-23 अहिंसा के विशेष परिप्रेक्ष्य में जैन धर्म और विश्वशांति - अजित जैन 'जलज'* सारांश "परस्परोग्रहो जीवानाम्' को मूल मंत्र मानने वाले जैन धर्म एवं दर्शन के सार्वभौमिक एवं सर्वकालिक सत्य सिद्धांतों ने विगत सहस्रों वर्षों में विश्वशांति में अनन्य योगदान दिया है तथा वर्तमान विश्व की ज्वलंत समस्याओं को भी जैन जीवन मूल्यों के द्वारा हल किया जा सकता है। जैन धर्म के अंतिम तीर्थकर महावीर स्वामी ने अहिंसा एवं अनेकांत की जो सूक्ष्म विवेचना की, उसका सम्पूर्ण मानवता पर गहरा प्रभाव पड़ा। महामानव महात्मा गांधी ने जैनदर्शन को आत्मसात करके अहिंसा का एक ऐसा प्रायोगिक रूप प्रस्तुत किया जिससे पूरी दुनिया ने परतंत्रता के बंधन तोड़े। वस्तुतः 'गांधी' के पूरे जीवन एवं विचारों में जैन सिद्धांतों के साक्षात् दर्शन होते हैं तथा 'गांधीवाद' आज विश्व की सबसे सशक्त, विचारधारा मानी जाने लगी है। अगर हम दूसरे के पक्ष को उसी के दृष्टिकोण से देखने की कोशिश करें तो कटुता और आतंकवाद दूर हो सकता है जिसके लिये आवश्यक 'माध्यस्थ भाव' जैन दर्शन ही सिखा सकता है। सभी जीवों पर दया एवं शाकाहार करने मात्र से खाद्यान्न समस्या, जल समस्या, ग्लोबल वार्मिग इत्यादि को समूल नष्ट किया जा सकता है। यह अहिंसा कोई कोरी दार्शनिक अवधारणा मात्र नहीं है बल्कि इसके प्रचुर वैज्ञानिक तथ्य प्रामाणिक रूप से उपलब्ध हैं जिसकी विस्तृत शोधपरक विवेचना प्रस्तुत शोध पत्र में की गई है। - सम्पादक __अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस (2 अक्टूबर) महात्मा गांधी के जन्मदिन को समर्पित है अतएव अहिंसा, जैन धर्म एवं विश्वशांति के त्रिभुज को समझने के लिये महात्मा गांधी के जीवन के एक प्रसंग से ही विवेचन आरंभ करते हैं। 'एक दिन शाम की प्रार्थना के चलते एक बड़ा सा साँप गांधी जी की पीठ पर चढ़ गया और वहीं बैठा रहा। ध्यान में डूबे गांधीजी ने प्रार्थना खंडित नहीं होने दी। उन्होंने अपनी खादी की चादर के पल्ले को धीरे से खोलकर खुद थोड़े आगे खिसक गये। साँप पीठ पर से उतरा और एक तरफ को चला गया ।' वस्तुतः सन् 1917 से 1930 तक गांधीजी की देखरेख में साबरमती का सत्याग्रह आश्रम चला। गांधीजी ने सब साथियों को समझाया कि हम साँपों की बड़ी बस्ती के बीच उनके मेहमान की तरह रहने आये हैं उनके साथ हमारा व्यवहार वैसे ही होना चाहिए जैसे मेहमान का होता है। छोटे से लेकर बड़े तक साँपों को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। साँप हमारे मित्र हैं । इस तरह 16 सालों तक दोनों तरफ से धर्म का परिपूर्ण पालन हुआ।' महामानव के उपरोक्त विचार एवं कार्य पर जैनधर्म के प्रभाव को जानने के लिये इस घटना से वर्षों पूर्व गांधीजी को उनके प्रश्नों के उत्तर में दिये गये जैन साधक श्रीमद् राजचंद्र के विचारों को जानते दक्षिण अफ्रीका में रहते समय गांधीजी 17वां प्रश्न पूछते है : 'जब मुझे सर्प काटने आये तब उसे काटने देना या मार डालना। उसे दसरी तरह से दर करने * अध्यापक - आवास, बड़ागाँव (घसान) जिला टीकमगढ़- 472010
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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