________________ सांस्कृतिक सम्पदा से परिपूर्ण संस्था है, जो मौलिकता को बनाये रखने में अग्रसर है। 11.03.11 -विभाष कुमार मानस पथ, पश्चिमी पटेल नगर, पटना-800023 कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ में प्रतिस्थापित सांस्कृतिक प्राचीन सम्पदा को जिस तरह संजोया गया है और जैन धर्म एवं अन्य साहित्य को जिस ढंग से प्रचारित एवं प्रसारित किया जा रहा है यह इस संस्थान की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जो व्यक्ति इस कार्य को अन्जाम दे रहे हैं वे बधाई के पात्र हैं हमारी शुभकामनाएं है कि यह संस्थान भारत के अग्रणी संस्थानों में अपना नाम करेगा। 11.03.11 - प्रो. जे.एन. गौतम कुलाधिसचिव जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म.प्र.) मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ 27.03.11 -जयन्त मलैया मंत्री, म.प्र. शासन, भोपाल कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ इन्दौर बहुआयामी संस्थान है। शोध, सर्वेक्षण, संरक्षण, प्रकाशन और प्रस्तुतिकरण के क्षेत्र में इसके कार्यकलाप अत्यन्त प्रशंस्य और उल्लेखनीय हैं / इसके संस्थापक, संचालक वृन्द और महामंत्री डॉ. अनुपम जी के योगदान, प्रत्युत्पन्न मतित्व और समसामयिकता के अवबोध का शतशः अभिनन्दन। 27.03.11 - प्रो. भागचन्द्र जैन, 'भागेन्दु', निदेशक, संस्कृत, प्राकृत तथा जैन विद्या अनुसंधान केन्द्र, दमोह (म.प्र.) अति उत्तम प्रयास, जितनी प्रशंसा की जाये..... थोड़ी है। इसे बनाये रखे, नई पीढ़ियों को दिशा मिलेगी। 28.03.11 - दिनेश चौबे, भास्कर टी.वी, इन्दौर बहुत अच्छी प्रदर्शनी है। बच्चों को इसके जरिये इतिहास को समझने में अवश्य मदद मिलेगी। 28.03.11 - चैतन्य मिश्रा 21, सेक्टर-ए, संगम नगर, इंदौर कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ में आयोजित त्रिदिवसीय 'भारत में गणितीय पांडुलिपियां' विषयक राष्ट्रीय सेमिनार के साथ विशेष कक्ष में प्रकाशित ग्रंथों की व्यवस्थित प्रदर्शनी को देखने का सुअवसर मिला। इस सुव्यवस्थित ज्ञान सम्पदा को देख मन प्रमुदित हो उठा। डॉ. अनुपम जैन को बधाई। 29.03.11 -प्रो. (डॉ.) प्रेमचन्द राँवका 2-2, श्रीजीनगर, दुर्गापुरा, जयपुर (राज.) सम्यक्ज्ञान ही जीवन उत्थान का कारण होता है प्रत्येक जीव को उस ज्ञान को प्राप्त करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। पुस्तकालय इसमें अच्छी भूमिका अदा करते हैं। इनके माध्यम से जीवन में आत्म उत्थान की ओर अग्रसर हो / कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ पुस्तकालय भी बहुत अच्छा माध्यम है। सम्यकज्ञान प्राप्त करने का। भव्य जीव सम्यकज्ञान प्राप्त कर आत्म कल्याण करें। 29.03.11 - प्रो. विक्रम जैन सेवानिवृत्त प्राध्यापक-अंग्रेजी 140 अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011