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जम्बूद्वीप पर सभी लोग न केवल मंदिरों के दर्शन करते हैं अपितु यहां ज्ञानार्जन एवं अध्ययन का अवसर भी प्राप्त होता है।
सम्मेलन के संयोजक प्रो. एस. सी. अग्रवाल ने सम्मेलन की आख्या प्रस्तुत की जिसमें उन्होंने प्रस्तुत किये गये सभी आलेखों की गुणवत्ता तथा सम्पूर्ण देश ही नहीं अपितु जापान से भी आये विद्वानों की सहभागिता पर संतोष व्यक्त किया। प्रतिभागियों की प्रतिक्रिया के क्रम में प्रो. जे. पी. एन. त्रिवेदी - द्वारका, श्री विजय साठे पूना, श्री जोसेफ मेनुउल-भोपाल तथा श्री रोहिता ईश्वर, मैसूर विश्वविद्यालय - मैसूर ने अपने विचार व्यक्त किये।
समापन उद्बोधन देते हुए कुलपति प्रो. अनूप स्वरूप ने कहा कि हस्तिनापुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों का संरक्षण बहुत जरूरी है यदि इसे अभी नहीं बचाया गया तो भविष्य में भी हमें इन उन्नत सभ्यता के कोई सबूत हाथ नहीं लगेंगे। उन्होंने हस्तिनापुर सहित आस पास के क्षेत्रों के रख रखाव हेतु एक संरक्षण निधि बनाने का प्रस्ताव किया एवं रूपये 10 लाख एकत्रित करने की घोषणा की जिसे सर्वानुमति से स्वीकार करते हुए शोभित विश्वविद्यालय - मेरठ, त्रिलोक शोध संस्थान हस्तिनापुर एवं अन्य लोगों ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया इस अवसर पर हस्तिनापुर घोषणा पत्र सम्मेलन की उपलब्धि के रूप में स्वीकार किया गया।
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सम्मेलन के समापन सत्र में सर्वानुमति से पारित 'हस्तिनापुर घोषणा पत्र'
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भारतीय सभ्यता सहस्वाब्दियों से शीर्षक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (ICTM-2010) में सम्मिलित हम सभी प्रतिभागी एवं प्रतिनिधिगण सर्वसम्मति से यह संकल्प करते हैं कि हस्तिनापुर में एवं इसके समीपवर्ती क्षेत्रों में स्थित अत्यन्त महत्वपूर्ण प्राचीन सभ्यता के शोध, खोज एवं संरक्षण हेतु 10 लाख रुपये की प्रारंभिक राशि से एक ध्रुव फण्ड की स्थापना करेंगे। साथ ही हस्तिनापुर एवं इसके परिवर्ती क्षेत्रों में स्थित पौराणिक, पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक अवशेषों को यूनेस्को विश्व सम्पदा घोषित करने की मुहिम की उद्घोषणा करते हैं।
पूज्य गणिनीप्रमुख आर्थिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि भारतीय सभ्यता हमारी धरोहर है। यदि हम इस धरोहर को गंवा देगें तो हमारे पास कुछ नहीं बचेगा। भारतीय संस्कृति को विद्वान ही जीवित रख रहे हैं। उन्होंने विद्वानों का आह्वान किया कि आप सब भारतीय संस्कृति से प्रेम करते हैं। इसलिये आपकी मातृभाषा कोई भी हो, भले ही आप दक्षिण भारत के हो किन्तु आपको अपने लेख का सारांश राष्ट्रभाषा हिन्दी में जरूर देना चाहिए जिससे आपके शोध निष्कर्षों को हिन्दी भाषी भी अच्छे से समझ सकें। सभी प्रतिभागियों ने गणिनी ज्ञानमती शोधपीठ की मातृ संस्था दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के सुरम्य परिसर, यहां के व्यवस्थापकों के आत्मीय व्यवहार, संस्कृति के प्रति अनुराग, आतिथ्य की भूरि-भूर प्रशंसा की और यह सर्वानुमति से निर्णय किया गया कि (I.C.T.M. 2011) एवं आगे भी यह आयोजन इसी परिसर में आयोजित किया जाये। इस प्रस्ताव पर कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन एवं कुलपति प्रो. अनूप स्वरूप ने अपनी सहमति प्रदान की
अगले वर्ष पुनः जम्बूद्वीप के परिसर में मिलने के भाव एवं पूज्य माताजी के वात्सल्य की सुखद अनुभूतियों सहित सभी ने विदा ली।
* आयोजन सचिव सम्मेलन निदेशक गणिनी ज्ञानमती, शोधपीठ जम्बूद्वीप- हस्तिनापुर - 250404
अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011