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________________ समान ही है, अन्तर केवल इतना है कि इसमें जोड़ने के स्थान पर घटाना पड़ता है। 5. भाग-भाग जाति - अर्थात निम्न स्वरूप की भिन्ने - भाग के परिकर्म को प्रदर्शित करने का कोई चिन्ह न होने के कारण, इन भिन्नों को भी भागानुबन्ध जाति की भिन्नों की भाँति ही लिखते थे यथा अथवा भाग इत्यादि क्रियाओं का ज्ञान प्रश्न से विदित किया जाता था ; उदाहरणत: 1 - को षड्भागभाग द्वारा सूचित करते थे। जिसका अर्थ है, 'एक भाग का छठवाँ भाग' अर्थात् - द्वारा विभाजित।' यह जाति सभी गणितज्ञों ने नहीं दी है। आचार्य श्रीधर और आचार्य महावीर तथा कुछ अन्य गणितज्ञों ने यह जाति दी है। 6. भागमातृ जाति - अर्थात् उपर्युक्त स्वरूपों के मिश्रण से उत्पन्न भिन्ने - महावीर ने लिखा है कि ऐसी भिन्नें 26 प्रकार की हो सकती हैं। श्रीधर ने इस जाति के अन्तर्गत निम्नलिखित उदाहरण दिया है - 'आधा, चौथाई का चौथाई, त्रिभागभाग, अपने आधे से युक्त आधा और अपने आधे से रहित तृतीयांश को जोड़ने पर क्या धन होगा?' 1 1- (क) + (1-)- (-) - (6-3-का) -का- 1 + 1 1 . - - + 1 -+--का 3 3 प्राचीन भारतीय पद्धति के अनुसार यह इस प्रकार लिखा जाता था - -+-का12 2 2 भारतीय संकेत का अवगुण स्पष्ट है; क्योंकि को-+और - 44 - | को 1 - भी पढ़ सकते हैं। अतएव संकेत का यथार्थ अर्थ प्रश्न के संदर्भ से - ही जाना जा सकता है। अर्हत् वचन, 14 (2 - 3), 2002 | 24 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.526554
Book TitleArhat Vachan 2002 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2002
Total Pages148
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size9 MB
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