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करते हैं। इनका जीवन दूसरे जीवधारियों के लिये भी उपयोगी होता है जबकि मांसाहारी शेर - चीते आंतरिक रूप से शक्तिहीन भयभीत तो रहते ही हैं, बाह्य में वे प्रकृति की व्यवस्था में विघ्न पैदाकर उसे असंतुलित भी करते हैं। जीवधारियों के भोजन, उनकी दिनचर्या तथा दूसरे जीवधारियों एवं प्रकृति के साथ सह - सम्बन्धों की दृष्टि से मांसाहारी जीवों की तुलना में शाकाहारी जीव प्रकृति के अधिक निकट होते हैं और वे परस्पर उपकार एवं सद्भाव के साथ अपना जीवन जीते हैं। उनका जीवन सहज, सरल तो होता ही है, दूसरों के लिये वे उपयोगी एवं सहायक सिद्ध होते हैं।
मनुष्यों की स्थिति इन जीवधारियों की तुलना में कुछ भिन्न है। वह प्रकृति का सर्वाधिक सामर्थ्यवान, ज्ञानवान एवं बुद्धिमान उपहार है। उसे भोग के साधनों के साथ ही ज्ञान के विकास के साधन भी उपलब्ध हैं। यह मनुष्य के स्वविवेक एवं संस्कार पर निर्भर करता है कि वह अपनी शक्तियों का सदुपयोग स्व - कल्याण के साथ विश्व के अन्य जीवों के कल्याण में करता है या स्वार्थी बना दूसरों के हितों का शोधक एवं पर - पीड़क बनता है। इस दृष्टि से मनुष्य की आध्यात्मिकता का चरम बिन्दु परमात्मा पद पाने की सामर्थ्य है तो दूसरी ओर वह क्रूर, निर्दयी, स्वार्थी, परपीड़क भी बन सकता है।
शरीर एक पात्र है जिसमें चैतन्य - आत्मा निवास करती हैं। पात्र यदि स्वच्छ है तो उसके साथ निवास करने वाला साथी भी तदनुसार स्वच्छ सरल होगा। यदि पात्र विषाक्त है तो उसका प्रभाव चैतन्य आत्मा पर पड़े बिना नहीं रहेगा। शरीर को कार्यशील बनाये रखने के लिये भोजन की आवश्यकता होती है। यद्यपि शरीर - रचना एवं प्रकृति से मनुष्य शाकाहारी है फिर भी स्वाद, मनोरंजन एवं स्थानीय विशेषताओं की दृष्टि से मानवीय भोजन का स्वरूप क्या हो, यह विचार विवाद का विषय बनता जा रहा है। इस पर विचार करने के कई पहलू हैं जिनके आधार पर मानव के श्रेष्ठ आहार का निर्णय किया जा सकता है। शारीरिक संचना - शरीर रचना की दृष्टि से मनुष्य का आहार कृषि - उपज, वनस्पति एवं फलों के साथ जुड़ा हुआ है। मनुष्य के दांत, जबड़े, आंतों की लम्बाई, पेट का आकार एवं स्वभाव आदि सभी दृष्टियों से विचार करने पर मनुष्य का भोजन अन्न, फल एवं वनस्पतियाँ हैं जिसे सात्विक आहार कहा जाता है। मांसाहार जिसमें अण्डे, मछली, मांस सम्मिलित हैं, मनुष्य की शारीरिक रचना की दृष्टि से अनुपयुक्त एवं वर्जित आहार है। अन्नाहार से कार्बोहाइड्रेट, रेशे, विटामिन, खनिज, प्रोटीन और चर्बी पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होती है। विविध प्रकार के फल, बीज, सूखे मेवे, दालें, शक्कर, मूंगफली, तेल एवं दूध आदि का यदि संतुलित एवं उचित मात्रा में उपयोग किया जाये तो उनसे शरीर की आवश्यकता पूर्ति के तत्त्व तो प्राप्त होते ही हैं, शरीर को बलिष्ठ निरोग एवं दीर्घायु बनाये रखने हेतु पर्याप्त तत्त्व भी मिलते हैं। अन्नाहार एवं शाकाहार में शारीरिक रोगों के निरोध की क्षमता भी विद्यमान है जबकि मांसाहार मानव शरीर रचना के प्रतिकूल एवं अनेक रोगों को उत्पन्न करने वाला तामसिक भोजन है जो इन्द्रिय भोग को उत्प्रेरित करता है। नैसर्गिक न्याय - नैसर्गिक न्याय एवं नैतिक दृष्टि से व्यक्ति को अपनी उदर पूर्ति एवं भोग के वे ही साधन अपनाने चाहिये जो विश्व के अन्य जीवों के लिये घातक या कष्टदायक न हो। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य की महत्ता इस बात से है कि वह प्रकृति की व्यवस्था में न्यूनतम हस्तक्षेप करे और अन्य जीवों को निर्भयतापूर्वक जीवनयापन करने दे। क्योंकि विश्व की सभी जीवात्मायें स्वभाव की दृष्टि से समान है और सब अपनी - अपनी मर्यादाओं एवं सीमाओं में अधिकतम सुखी रखना चाहती है। इस दृष्टि से अपने पेट को
अर्हत् वचन, अक्टूबर 99