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________________ भद्रबाहु चन्द्रगुप्त के समय में ही यहाँ सात सौ अन्य मुनिपुंगवों ने भी समाधिमरण किया था। गंग, राष्ट्रकूट, कदम्ब, चालुक्य, होयसल, विजयनगर आदि दक्षिणी राजवंशों के अनेक नरेशों, महारानियों, धनीमानी श्रेष्ठियों और अनगिनत धर्मप्राण श्रावक-श्राविकाओं के संरक्षण एवं पोषण ने इस तीर्थ क्षेत्र को सुन्दर जिनालयों एवं स्मारकों से अलंकृत कर दिया हैं। यह मात्र तपोभूमि, सिद्धभूमि और अतिशय क्षेत्र ही नहीं रहा वरन अनेक आचार्यो, भट्टारकों, विद्वानों और कवियों के प्रसाद से एक महान ज्ञानपीठ और सांस्कृतिक केंद्र हो गया। यह शिक्षा और दीक्षा की कर्मस्थली बन गया था। यहाँ के ज्ञान केन्द्र की तुलना तत्कालीन सुप्रसिद्ध नालन्दा विश्वविद्यालय से की गयी हैं। 3. बाहुबली प्रतिमा - विन्ध्यगिरि के शिखर पर भगवान बाहुबली की 57 फुट उत्तुंग अद्वितीय प्रतिमा की स्थापना से इस स्थान की ख्याति विश्वप्रसिद्ध हैं। यह प्रतिमा एकल ठोस ग्रेनाइट चट्टान से काटी गई है। इस प्रतिमा में विशालता, रूप, सौन्दर्य और देवातिशय का ऐसा सुयोग बन गया है कि उसकी छटा अपूर्व हो गई है। इस प्रतिमा को गोम्मटेश, गोम्मटेश्वर, गोम्मटनाथ, गोम्मटस्वामी, गोम्मटदेव आदि नामों से जाना जाता है। परन्तु आचार्य नेमिचंद्र ने इसके लिए 'दक्षिण कुक्कुटजिन' नाम का प्रयोग किया है। बाहुबली प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र थे। भगवान ऋषभदेव मूलत: एक राजा थे तथा उनकी नन्दा और सुनन्दा नाम की दो पत्नियाँ थी। बाहुबली की माता सुनन्दा तथा बहन सुन्दरी थी। माता नन्दा का पुत्र भरत और पुत्री ब्राह्मी थी। बाहुबली पोत्तनपुर के नरेश थे। ऐसी कथा है कि बाहुबली का उनके बड़े भाई भरत से युद्ध हो गया तथा उन्होंने उसे पराजित कर दिया। तदुपरान्त वे इतने दुखी हो गए कि उन्होंने सारा राजपाट त्यागकर सन्यास ग्रहण कर लिया और वर्षपर्यन्त अचल उपवासरत रहते हए खड़े रहे। वह पिता से भी पूर्व निर्वाण प्राप्त करके अवसर्पिणी के प्रथम मोक्षगामी हुए। संभवत: इसीलिए कविवर बोप्पण 'सुजनोत्तंस' ने लिखा है कि यह अनुपम प्रतिमा विग्रह लोक के लिए सतत देशना कर रही है कि कोई भी प्राणी हिंसा, असत्य, स्तेय, कुशील और परिग्रह में सुख न माने, अन्यथा मनुष्य जन्म वृथा चला जायेगा। 4. चामुण्डराय - इस प्रतिमा का निर्माण गंगनरेशों के विचक्षण मंत्री और महानसेनापति चामुण्डराय ने कराया था। उन्होंने इन पदों को मरूलदेव (953-961 ई.), मारसिंह (961 - 974 ई.). राजमल्ल (974- 984 ई.) और रक्कस गंगराज (985 ई.) के शासन कालों सुशोभित किया। ___ चामुण्डराय ने शूरवीरता, साहस और पराक्रम के लिए बड़ी ख्याति अर्जित की थी। जब यह युद्ध के लिए निकलता था तो उसके शत्रु भयभीत खरहों की भाँति शरण की खोज में दुबकते फिरते। राजादित्य को घायल करने में उसने आश्चर्यजनक हस्तकौशल दिखलाया, राच नामक महाबली शत्र सांमत के टकडे - टकड़े कर डाले और गोविंदराज को करारी हार दी थी। शूरवीरता के लिए उसे अनेक उपाधियाँ दी गई थी। रोडग के युद्ध में वज्वलदेव को पराजित करने पर उसे 'समर - धुरन्धर', गोनूर के युद्ध में नोलम्बो को पराजित करने अर्हत् वचन, अक्टूबर 99
SR No.526544
Book TitleArhat Vachan 1999 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size5 MB
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