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________________ कि इस काल में जैन विद्याओं से पोषित, अनवरत चली आ रही नगरीय संस्कृति (सिंधु संस्कृति से चली आ रही) जो प्रजातंत्र की प्रकृति की थी, का अस्तित्व था। जैन मतावलंबियों के वंश महत्वपूर्ण थे। जैनावलंबी भी अच्छी संख्या में थे। महावीर के जीवन काल में ही 'जीवंत स्वामी' की काष्ठ प्रतिमा का होना कोई अनहोनी बात नहीं लगती। वीतभयपत्तन की भौगोलिक स्थिति पर गौर करें तो वह सिंधु संस्कृति से जुड़ा लगता है। हेमचंद्राचार्य ने जो विवरण "जीवंत स्वामी' की मूर्ति के संदर्भ में दिये हैं वे भी पूर्णत: सच लगते हैं। इस क्षेत्र में जैन विद्याओं की उपस्थिति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। 5. 530 ई.पू. से कुछ पहले फारस के एकेमेनिड सम्राट साइरस ने हिन्दकुश पर्वतमाला को पार करके कैम्बोज, गंधार तथा सिंधु पार क्षेत्र के जनों से कर प्राप्त किया। हेरोडोट्स ने एकेमेनिड साम्राज्य के अधिक जनसंख्या वाले एवम् समृद्ध प्रांतों की गणना करते समय गांधार की चर्चा बीसवें सत्रपी अर्थात् प्रांत के रूप में की है। तक्षशिला सभी विचारों का महत्वपूर्ण केन्द्र था। सर्वप्रथम सिंधु सभ्यता में प्रचलित श्रमण (जैन) विद्याओं, फिर वेद विद्याओं, फिर इरानी विद्याओं तथा उसके बाद बौद्ध विद्याओं का तक्षशिला पर प्रभाव रहा। तक्षशिला का नगर कई बार खंडहरों में बदला। इसके पर्याप्त प्रमाण 6. कोसांबी से गंगा उपत्यका के ऊपर चलते हुए एक मुख्य मार्ग पंजाब के इस पार तक्षशिला तक जाता था जो पश्चिम के साथ स्थल व्यापार के लिए निर्गम मार्ग था। यह मार्ग सूचना का भी मुख्य साधन था। 7. तक्षशिला में अति प्राचीन स्तूपों की परंपरा थी। सम्यक विश्लेषण करके देखा जाय तो स्तूप परंपरा भी अति प्राचीन जैन परंपरा है जो बौद्ध परंपरा द्वारा अपना ली गई और समानान्तर रूप में भारत की सीमा पार भी इसे अपना लिया गया। मिस्र के पिरामिड इसी परंपरा से प्रेरित हैं।10 जान मार्शल ने तक्षशिला पर गहन खुदाई कार्य किया था और मार्शल का मत था कि सिरकप - तक्षशिला का स्तूप (ब्लाक 'एफ') एक जैन स्तूप रहा होगा क्योंकि इसके तलघर की देवकुलिका में बने कला प्रतीक दो दिखाये गये गरूढ़ की समता उन्हें मथुरा के आयागपट पर बने स्तूप के शिल्पांकन में मिली जिसे लोमशोभिका की पुत्री वासु ने निर्मित कराया था।11 तक्षशिला को उत्तर पश्चिम से होने वाले सतत हमलों से कल्पनातीत दमन का सामना करना पड़ा होगा। इस्लाम के अंध दीवानों ने तो संभवत: विनाशलीला का तांडव ही किया होगा। फिर भी तक्षशिला से प्राप्त कुछ पुरावशेष तक्षशिला में जैन प्रभुत्व को दर्शाते हैं। चांदी के रोल पर खरोष्ठी लिपि में खुदा हुआ संदेश जो तक्षशिला के धर्मराजिका स्तूप से प्राप्त हुआ थो में अर्हतों को भी नमस्कार किया गया है। 8. सिकंदर, चंद्रगुप्त, चाणक्य, भद्रबाहु और नंदराजाओं का काल एक ही था। तक्षशिला इस समय भी परिवर्तन के बावजूद महत्वपूर्ण नगर था यद्यपि तक्षशिला के नये राजा आंभी ने सिकंदर का विरोध नहीं किया तथा सिकंदर का आधिपत्य स्वीकार कर लिया, तथापि सिकंदर तक्षशिला की संस्कृति व साधुओं से अत्यंत प्रभावित था। वहाँ के साधुओं की ओर सिकंदर आकृष्ट हुआ। इन साधुओं का जो वर्णन यूनानी संदर्भो से प्राप्त हआ है वे श्रमण (जैन) लगते हैं। इन में से एक कल्याण मुनि को सिकंदर यूनान • ले जाने के लिए अपने साथ ले गया था। यह सभी संदर्भ जैन विद्याओं और जैन संघ के प्रभुत्व को तक्षशिला में स्थापित करते हैं। अर्हत् वचन, अक्टूबर 99 15
SR No.526544
Book TitleArhat Vachan 1999 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size5 MB
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