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इनमें व्यापक निवेश की तो जरूरत होती है, परिणाम भी विलम्ब से प्राप्त होते हैं। मैं यहाँ ऐसे ही कुछ कार्यों को सूचीबद्ध कर रहा हूँ हमारे पाठकगण ही इनकी आवश्यकता एवं उपयोगिता के बारे में निर्णय करेंगे। मैं दिगम्बर जैन समाज को केन्द्र बिन्दु बनाकर ही इन बिन्दुओं की चर्चा कर रहा हूँ, क्योंकि इस समाज के बारे में अपेक्षाकृत अधिक जानकारी है। 1. देव-शास्त्र-गुरु के प्रति अनन्य श्रद्धा रखने वाली हमारी समाज ने क्या हमारे तीर्थ क्षेत्रों एवं वहाँ विराजमान जिन बिम्बों की कोई अद्यतन सूची तैयार की है?
शायद नहीं। लगभग 25 वर्ष पूर्व प्रकाशित भारत के दि. जैन तीर्थ के 5 खण्ड इस आवश्यकता की आंशिक पूर्ति ही करते हैं क्योंकि जहाँ उसमें संग्रहीत साम्रगी काफी पुरानी पड़ चुकी है, वहीं वे विराजमान जिन बिम्बों के बारे में कोई यथेष्ट जानकारी नहीं दे पाते। एक मानक प्रारूप के अन्तर्गत भारत के दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र, कल्याणक क्षेत्र, अतिशय क्षेत्र, कला क्षेत्र आदि के बारे में पूरी जानकारी एकत्रित की जानी चाहिये। यत्र-तत्र विकसित हो रहे नवोदित तीर्थों के बारे में भी समीचीन जानकारी समाहित करते हुए भारत के दि. जैन तीर्थ पुस्तक श्रृंखला के नये सचित्र, प्रामाणिक मानक संस्करण निकालने की प्रक्रिया अविलम्ब प्रारम्भ की जानी चाहिये एवं प्रत्येक 10-15 वर्ष के अन्तराल से इसके नये संशोधित संस्करण निकालने की व्यवस्था होनी चाहिये। 2. क्या भारत के समस्त दिगम्बर जैन मन्दिरों/चैत्यालयों की कोई सूची है?
नहीं। "दिगम्बरत्व का वैभव' शीर्षक से दिगम्बर जैन महासमिति द्वारा प्रकाशित पुस्तक (1985) में इस दिशा में प्रयास किया गया। दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर एवं अ. भा. दि. जैन महिला संगठन, इन्दौर द्वारा भी इस दिशा में प्रयास किये गये, किन्तु दृढ़ इच्छाशक्ति, संकल्पशीलता के अभाव एवं कार्य की व्यापकता, जटिलता के कारण ये संस्थायें इस अति महत्वपूर्ण कार्य को पूर्ण न कर सकीं। वस्तुत: आज संस्थायें कार्य को उसके महत्व एवं आवश्यकता के आधार पर नहीं, अपितु उसके परिणामों के प्राप्ति की समयावधि, संस्था को होने वाले तात्कालिक लाभ आदि को दृष्टि में रखकर परियोजनाओं को हस्तगत करती हैं। यह उचित नहीं है। तथापि मैं इस ओर दृष्टिपात करने वाली इन तीन संस्थाओं के प्रबन्धकों को साधुवाद देता हुआ उनसे यह अनुरोध करता हूँ कि वे इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं को दूर कर इन्हें यथाशीघ्र पूर्ण करें। इन तीनों संस्थाओं का इस हेतु परस्पर सहयोग, संकलित सूचनाओं एवं अनुभवों का आदान-प्रदान कार्य को सुगम बना सकता है। यथाशीघ्र तैयार की गई सूची के प्रकाशन के उपरान्त इस सूची के परिशिष्ट प्रत्येक 3 से 5 वर्ष में निकालने की भी व्यवस्था होनी चाहिये। 3. भारत एवं विदेश के उन नगरों तथा ग्रामों, जहाँ दि. जैन बन्धु निवास करते हैं, की सूची क्या हमारे पास है?
नहीं। जब हम जैन बन्धुओं के निवास स्थलों की ही जानकारी नहीं रखते तो फिर उन नगरों की समाज, समाज बन्धुओं के पत्राचार/दूरभाष सम्पर्क सूत्र, समाज के व्यक्तियों की जनगणना एवं प्रतिभाओं की बात ही छोड़ दीजियेगा। इसके अभाव में किसी भी सभा, समिति, परिषद या सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधि संगठन कैसे माना जा सकता है? वह समाज के सभी बन्धुओं तक अपनी बात, अपनी आवाज कैसे पहुँचा सकता है? अपनी प्रतिभाओं/निधियों की कैसे सुरक्षा करेगा, कैसे मदद करेगा? सूचना क्रांति के वर्तमान युग में सूचनाओं की
अर्हत् वचन, अप्रैल 99