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सम्पादकीय
अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर
सामयिक सन्दर्भ
अर्हत् वचन प्रकाशन श्रृंखला का 42 वाँ पुष्प आपको समर्पित करते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता है। जहाँ इस अंक में हमने गत "सराक एवं जैन इतिहास' अंक की कुछ शेष सामग्री प्रकाशित की वहीं इस अंक में समाजशास्त्र एवं अर्थशास्त्र विषयक सामग्री भी देने का प्रयास किया है। हमारे पाठकों एवं सम्मानित लेखकों का दीर्घ काल से आग्रह था कि सामाजिक विज्ञान के विषयों को भी अर्हत् वचन में सम्मिलित किया जाये। उनके इसी परामर्श का सम्मान करते हुए इस अंक में आचार्य गोपीलाल 'अमर', डॉ. जयश्री सुनील भट्ट एवं डॉ. गणेश कावड़िया के आलेख प्रकाशित किये हैं। महान राजनीतिज्ञ एवं नीतिकार आचार्य चाणक्य पर लिखा श्री सूरजमल बोबरा का आलेख भी नये क्षितिज को स्पर्श कर रहा है। हमें विश्वास है कि हमारा पाठक वर्ग इन आलेखों को रुचिकर एवं ज्ञानवर्द्धक पायेगा। जैन इतिहास एवं पुरातत्व पर तो सामग्री दी ही है किन्तु गत अंक में की गई घोषणा के बाद भी स्थानाभाव के कारण हम प्रो. ए. सुन्दरा, डॉ. टी. गणेशन एवं श्री नेमचन्द डोणगांवकर के आलेख इस अंक में नहीं दे पा रहे हैं, हम उन्हें आगामी अंकों में अवश्य प्रकाशित करेंगे। अगला अंक 11(3) हम प्राथमिकताओं के अनुरूप पुन: जैन विज्ञान को समर्पित कर रहे हैं। इसकी एक झलक हमारे पाठकों को पृष्ठ 4 पर अगले अंकों में प्रकाश्य आलेखों की सूची से मिल सकती है। निश्चयेन हमारे पास विज्ञान विषयक अन्य भी कई आलेख प्रकाशनाधीन हैं जिन्हें शीघ्र ही प्रकाशित करने हेतु हम प्रयत्नशील हैं। संसाधनों की सीमायें सदैव रहती हैं किन्तु यदि हमारे माननीय लेखकगण एवं विज्ञ पाठकगण सदस्यता वृद्धि में भी हमें सहयोग करें तो काम आसान हो सकता है। जनवरी-मार्च 99 के मध्य चलाये गये सदस्यता अभियान के उत्साहवर्द्धक परिणाम आये हैं और हम इसे निरन्तर जारी रखने हेतु संकल्पबद्ध हैं।
इन पृष्ठों पर हम सदैव से महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों पर चर्चा करते रहे हैं, विशेषत: उन विषयों पर जिनमें समाज के अकादमिक अभिरूचि सम्पन्न व्यक्तियों का योगदान हो सकता है। विगत कुछ वर्षों से मैं देख रहा हूँ कि देश में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं की बाढ़ सी आ गई है। जहाँ एक दशक पूर्व मात्र गिनी-चुनी जैन समाज की राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें थीं, वहीं अब उनकी संख्या इतनी हो गई है एवं उनमें इतनी तेजी से विस्तार हो रहा है कि शायद ही जैन समाज का कोई सक्रिय कार्यकर्ता हो जिसे इन सबका नाम मालूम हो। फिलहाल मुझको इन सबकी सूची भी देखने को नहीं मिली। स्थापित होने वाली प्रत्येक संस्था का कोई न कोई उद्देश्य होता है और उस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उस संस्था के पदाधिकारियों द्वारा किये जा रहे प्रयासों से धर्म और समाज को लाभ भी होता है, किन्तु कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो संगठित समाज के लिये आवश्यक नहीं अपितु अनिवार्य भी होते हैं एवं इनके न होने से समाज को अपूरणीय क्षति उठानी पड़ती है, भले ही उसका अहसास हमें तत्काल न हो। इन कार्यों को कोई व्यक्ति नहीं कर सकता, इसके लिये संस्था का ही सहारा लेना पड़ता है। क्योंकि यह सतत् चलने वाले कार्य होते हैं एवं
अर्हत् वचन, अप्रैल 99