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अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर
वर्ष - 11, अंक - 2, अप्रैल 99, 33 - 36 जैन आगम साहित्य में अर्थ चिंतन
- गणेश कावड़िया *
समन्वित मानव जीवन और उसके विकास के लिये चार पुरूषार्थ - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताये गये हैं। इसमें अर्थ को महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिये जैन आगम साहित्य में अर्थ पर काफी चिंतन मिलता है। धन अर्थात् सम्पत्ति के स्वरूप उसकी प्रकृति तथा उसके उपभोग पर काफी चिंतन तथा दिशा निर्देश मिलते हैं। इनका पालन किया जाये तो एक सुख तथा शान्ति युक्त समाज की स्थापना हो सकती है। जैन दर्शन धर्म के दो स्वरूप को मानता है। प्रथम जीवनव्यापी धर्म तथा द्वितीय नियत् कालिक धर्म। जीवनव्यापी धर्म में व्यक्ति अपनी समस्त क्रियाओं को करते हुये धर्म के फल को प्राप्त कर सकता है। इसे अणुव्रत का सिद्धान्त कहते हैं। भगवान महावीर ने कहा कि "धम्मेणं विते कप्पेमाणा"1 अर्थात अल्प इच्छा वाला व्यक्ति धर्म के साथ अपनी आजीविका चलाता है।
नव जैन साहित्य में अर्थ पर अपेक्षाकृत कम लिखा गया अत: यह मत प्रतिपादित किया जाने लगा कि जैन धर्म अर्थ को उचित स्थान नहीं देता है। वास्तव में जैन दर्शन में श्रावक के लिये विभिन्न नियमों के अन्तर्गत उपभोग, उत्पादन, विनिमय, वितरण तथा अर्थतंत्र के बारे में विचार मिलते हैं। असिकर्म, मसिकर्म' आदि में मनुष्य के पुरूषार्थ के बारे में निर्देश मिलते है। इन नियमों से एक ऐसे अर्थतंत्र का विकास हो सकता है जिसमें विकास मानव केन्द्रित हो तथा सम्पूर्ण विश्व में सुख तथा शान्ति की स्थापना हो सकती है। आज जब पूरा विश्व अशांति तथा तनाव से ग्रस्त है ऐसे में जैन दर्शन एक ऐसे अर्थतंत्र की रूपरेखा प्रस्तुत कर सकता है जो मानव के भावनात्मक विकास में सहायक हो। इस आलेख में जैन आगमों के उन कथनों की विवेचना करने का प्रयास किया है जिनका संबंध अर्थतंत्र से है। वृत्ति कला का ज्ञान
प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पूर्व कल्पवृक्ष काफी मात्रा में थे अत: मनुष्य को धन अर्जन करने के लिये कोई कर्म अर्थात पुरूषार्थ नहीं करना पड़ता था। जब भी कोई आवश्यकता हुई, वे कल्प वृक्ष से मांग लेते थे। इसलिये व्यक्ति को किसी वृत्ति की आवश्यकता नहीं होती थी। जब भगवान ऋषभदेव के काल में कल्प वृक्षों का क्षय होने लगा तब समाज और समुदाय को यह चिंता होने लगी कि व्यक्ति अपनी आवश्यकता की तृप्ति कैसे करे? यह डर लगने लगा कि कहीं मनुष्य अपनी उदर पूर्ति के लिये जीवों का भक्षण करने लगे। इन परिस्थितियों में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने मनुष्य को वृत्ति अर्थात व्यवसाय का ज्ञान दिया। उस समय कृषि ही मुख्य क्रिया संभव थीं। कृषि में भूमि, सिंचाई, श्रम तथा साधन (पूँजी) की चर्चा की जो औपचारिक अर्थशास्त्र में उत्पादन के साधन कहलाये। इस अर्थ में ऋषभदेव अर्थशास्त्र के भी जनक हैं।
कृषि कला अर्थात जीवन वृत्ति के लिये प्रकृति का संरक्षण आवश्यक था। अत: जैन आगम में संचित वनस्पति को नष्ट करना पाप माना गया है। वनस्पति का पोषण करो और उससे फल प्राप्त करो। इस प्रकार उन्होंने ऐसी वृत्ति का सूत्रपात किया जिसमें
* रीडर - अर्थशास्त्र, दे. अ. वि. वि., इन्दौर। निवास : अहना अपार्टमेन्ट, 334, इन्द्रपुरी कालोनी, इन्दौर। ..