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________________ थे जबकि श्राविकायें पाँच लाख थीं, यानी श्रावकों से सदसठ प्रतिशत अधिक। अंतिम तीर्थंकर महावीर के समवसरण में साधु चौदह हजार थे, जबकि साध्वियाँ छत्तीस हजार थीं, यानी साधुओं से एक सौ सत्तावन प्रतिशत अधिक, श्रावक एक लाख थे, जबकि श्राविकायें तीन लाख थीं, यानी श्रावकों से दो सौ प्रतिशत अधिक। चौबीस तीर्थंकरों के समवसरणों में संयुक्त रूप से साध्वियाँ साधुओं से अठत्तर प्रतिशत अधिक और श्राविकायें श्रावकों से एक सौ प्रतिशत अधिक थीं। तीर्थंकरों के गर्भाधान से मोक्ष तक पाँचों कल्याणक - महोत्सवों में नारियों का योगदान उल्लेखनीय होता है। तीर्थंकर की माता किसी-न-किसी जन्म में अवश्य ही मुक्त होती है। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि जैन धर्म में नारी की हैसियत कितनी ऊँची है। आज साधुओं की अपेक्षा साध्वियों की संख्या अधिक है और धार्मिक आचार - विचार में श्रावकों की अपेक्षा श्राविकायें अधिक आगे रहती हैं। जैन नारियों में शिक्षा समवसरण और चतुर्विध संघ में साध्वियों और श्राविकाओं की इतनी बड़ी संख्या उनका प्रबल धार्मिक उत्साह सूचित करती हैं। धार्मिक उत्साह स्वाध्याय से ही आ सकता है। स्वाध्याय के लिये शिक्षा आवश्यक है। उन असंख्य साध्वियों और श्राविकाओं की शिक्षा औपचारिक या स्कूली चाहे न रही हो, लेकिन उनके शिक्षित रहे होने में संदेह नहीं किया जा सकता। औपचारिक शिक्षा भी उन दिनों रही होनी चाहिये, क्योंकि, तब बहुत पहले, तीर्थंकर ऋषभनाथ अपनी पुत्रियों ब्राह्मी और सुन्दरी को लिपि विद्या और अंकगणित सिखाने के साथ औपचारिक शिक्षा की परंपरा स्थापित कर चुके थे। उस परंपरा के टूटने के संकेत नहीं मिलते, इससे प्रमाणित होता है कि वह अंतिम तीर्थंकर महावीर के समय तक चली। भारतीय हास के सभी कालों में, जीवन के सभी क्षेत्रों में चमकती- दमकती जैन नारियाँ सिद्ध करती हैं कि तीर्थंकर भगवान महावीर के पश्चात् भी जैन समाज ने नारी - शिक्षा पर यथोचित ध्यान दिया। 'Seven Great Religions' में एनी बीसेंट ने जैन नारियों की शिक्षा के बारे में लिखा है कि 'वे नारियों की शिक्षा पर बहुत ज्यादा जोर देते हैं और जैन साध्वियों का एक बहुत बड़ा काम है शिक्षा देना और यह देखना कि उस शिक्षा पर अमल हो। यह एक ऐसी बात है, जिस पर, मेरे विचार से, हिन्दू लोग जैन लोगों से प्रेरणा ले सकते हैं, ताकि हिन्दू नारियाँ भी इस प्रकार शिक्षित की जा सकें कि उनकी पारंपरिक आस्था न डिगे और वे अपने उस धर्म के प्रति उदासीन न हो जायें जिसका उपदेश उनके अपने ऋषियों द्वारा दिया गया है। वर्तमान जैन समाज की शीर्ष संस्थाओं में महिला-शाखाओं, महिला - प्रकोष्ठों आदि का प्रावधान है। स्वतंत्र अ. भा. महिला संगठन भी हैं। विभिन्न स्तरों पर जैन महिला सम्मेलन भी समय-समय पर होते रहते हैं। अनेकानेक जैन महिलाएँ स्वतंत्रता संग्राम में आगे रहीं, अधिकांश क्षेत्रों में उच्च पदों पर आसीन हैं, लेखन, संपादन, व्यवसाय आदि द्वारा देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं। विश्वविद्यालयों तथा अन्य संस्थाओं में हो रहे शोध - सर्वेक्षण आदि पर अलबत्ता जैन समाज का ध्यान कम गया है। जैन नारियों के पौराणिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक आदि पक्षों पर लगभग आठ शोध प्रबन्ध लिखे जा चुके हैं, जिनकी नामावली अर्हत् वचन, अप्रैल 99
SR No.526542
Book TitleArhat Vachan 1999 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size23 MB
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