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________________ यह जुमला आज का नहीं, कल का नहीं, यह है लगभग 935 ईस्वी का, जिसे आचार्य सोमदेव सूरि ने बतौर एक फतवे के कलमबन्द किया। ऐसा फराख - ओ - फैयाज फतवा, ऐसी सम्प्रदाय - निरपेक्ष व्यवस्था, ऐसी मुक्त - कंठ घोषणा, शायद ही कभी किसी और धर्मशास्त्री ने की हो। जैन अध्यात्म में नारी का विकास दूसरी ओर, मोक्ष - मार्ग का पालन करने - कराने में जैनाचार्य वज्र से भी कठोर थे, जैसा कि गुणस्थानों (आत्म - शुद्धि के चौदह सोपानों) और गृहस्थों तथा साधुओं की घेराबंद आचार - संहिता से प्रमाणित होता है। इसका एक उदाहरण है नारी के विकास का आध्यात्मिक सिद्धान्त। अध्यात्म की आखिरी मंजिल. यानी मक्ति के लिये जो मानसिकता दृढ़ता और शारीरिक कठोरता चाहिये, वह नर में प्रकृति से है (द स्ट्रांगर सेक्स), इसलिये नर की मुक्ति पर जैन धर्म में कोई मतभेद नहीं हुआ। नारी- मन भावुक है और नारी- तन नाजुक है (द वीकर सेक्स), इसलिये वह मानसिक दृढ़ता और शारीरिक कठोरता नारी में अपेक्षाकृत कम है, इसलिये एक वर्ग ने नारी की प्रकृति को मुक्ति के लिये अपर्याप्त या गैर - मुआफिक माना और कहा कि किसी अगले जन्म में नर के रूप में उत्पन्न होकर वही नारी मुक्त हो सकती है। पन्द्रहवीं- सोलहवीं शती में लुप्त हो चुके यापनीय संघ नामक प्रमुख जैन सम्प्रदाय ने नारी - स्वातंत्र्य पर विशेष बल दिया। दरअसल जैन सिद्धान्त इस सन्दर्भ में बहुत ही स्पष्ट और शाश्वत है। आध्यात्मिक विकास की शर्त, जैन धर्म के अनुसार, तपस्या है, जिसका मतलब है तमाम तरह की हसरतों का कतई खात्मा, यानी इच्छाओं की समाप्ति। इस दृष्टि से नारी की भूमिका कितनी बुनियादी है, कितना सार्थक है, इसकी झलक मिलती है समाज - संगठन के जैन सूत्र से। चतर्विध संघ में नारी की महत्ता 'जैन समाज के लिये शास्त्रीय शब्द है 'चतुर्विध संघ' - (1) साधु, यानि सांसारिक संबंधों से पूरी तरह दूर हुए तपस्वी पुरुष, (2) साध्वियाँ या आर्यिकायें, यानी सांसारिक संबंधों से पूरी तरह दूर हुई तपस्वी नारियाँ, (3) श्रावक, यानी सांसारिक संबंधों से दूर होने का अभ्यास करते गृहस्थ पुरुष और (4) श्राविकायें, यानी सांसारिक संबंधों से दूर होने का अभ्यास करती गृहस्थ नारियाँ। सामाजिक संगठन के इस सूत्र में कई सिद्धान्त छिपे हैं, व्यावहारिकता और तर्जे अमल दिखते हैं, वैज्ञानिक न्याय - निष्ठा चमकती है, संस्कृत के 'अर्धांगिनी', वामांगना' और अंग्रेजी 'बेटर हाफ', 'दि फेयर सेक्स' आदि मुहावरों की सार्थकता झलकती है। इस सूत्र के मुताबिक पुरुष - वर्ग और नारी - वर्ग का हिस्सा बराबर का होना चाहिये, लेकिन आध्यात्मिक विकास की होड़ में नारी - वर्ग हमेशा आगे रहा, खासा आगे रहा। शास्त्रों के अध्ययन - अध्यापन करने और तीर्थंकर का उपदेश प्रत्यक्ष रूप से सुनने का उन्हे न केवल अधिकार रहा है, बल्कि प्रत्येक तीर्थंकर के समवसरण में नारियों के लिये बारह में से पाँच प्रकोष्ठों का प्रावधान होता है। समवसरणों में उनकी उपस्थिति के आँकड़े भी पुरुषों से बहुत अधिक हैं, प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ के समवसरण में साधु चौरासी हजार थे, जबकि साध्वियाँ तीन लाख पचास हजार थीं, यानी साधुओं से तीन सौ सत्रह प्रतिशत अधिक, श्रावक तीन लाख 10 अर्हत् वचन, अप्रैल 99
SR No.526542
Book TitleArhat Vachan 1999 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size23 MB
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