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________________ भगवान ऋषभदेव राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन जम्बूद्वीप - हस्तिनापुर (मेरठ) उ.प्र. - दिनांक 4-6 अक्टूबर 1998 जम्बूद्वीप घोषणा पत्र - 1998 प्रास्ताविक - जैनधर्म प्राकृतिक एवं अनादि निधन धर्म है, जिसका उद्देश्य आत्मा को परमात्मा के रूप में परिणित करना है। भगवान ऋषभदेव से लेकर भगवान महावीर तक चौबीस तीर्थकरों ने इसका प्रचार प्रवर्तन किया है। भगवान ऋषभदेव वास्तव में भारतीय संस्कृति में समन्वयकारी सूत्र हैं, जो समस्त मानव जाति के लिये विशुद्ध आदर्श है। मूर्त और अमूर्त जगत के बीच, प्रवृत्ति और निवृत्ति के बीच तथा प्रभाव एवं अभाव के बीच सन्तुलन स्थापित करने की कला भगवान ऋषभदेव ने मानव जाति को सिखायी, जो उनका एक अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी शिक्षाएँ मात्र किसी एक धर्म, समाज या राष्ट्र के लिए नहीं अपितु समस्त प्राणियों के लिए प्रासंगिक हैं। मानवीय कल्याण के लिए प्रदत्त उनके उपदेश सामाजिक विघटन, शोषण, साम्प्रदायिक विद्वेष आदि अनेक विसंगतियों को दूर करने के लिए एक अमोध अस्त्र है। उन्होंने अपनी पुत्रियों ब्राह्मी और सुन्दरी को सर्वप्रथम लिपि एवं अंक विद्या की शिक्षा प्रदान कर नारी शिक्षा का अथ किया था, जिसने मानवीय ज्ञान के विकास को एक नई दिशा प्रदान की। परम पूज्य गणिनीप्रमुख, आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी का चिन्तन वैशिष्ट्य - पूज्य आर्यिका श्री के चिन्तन में इस तथ्य को एक लम्बी अवधि से रेखांकित किया गया कि भगवान ऋषभदेव के साथ भारतीय चिन्तन की सामयिक दृष्टि ने यथेष्ट न्याय नहीं किया है। उनकी चिन्ता इस विचार प्रवाह के साथ सर्वाधिक रही है, जिसने भगवान महावीर को जैनधर्म के प्रवर्तक के रूप में आख्यायित कर इतिहास के साथ खिलवाड किय और किया है अन्याय जैन परम्परा के साथ। पूज्य मातुश्री की मंगल प्रेरणा से अनेकों अवसर पर विभिन्न माध्यमों से इस विसंगति की ओर ध्यान दिलाया गया है और वस्तुनिष्ठ सत्य की प्रतिष्ठापना के प्रयास किये गये हैं। भगवान ऋषभदेव राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन - भारत में सम्प्रति 237 विश्वविद्यालय वर्तमान में हैं, जिनके अन्तर्गत लगभग दस हजार महाविद्यालय छात्र-छात्राओं को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। विश्वविद्यालयों के तीनों प्रकार - केन्द्रीय, राज्य एवं मानित विश्वविद्यालय, मात्र लीक पर चल कर प्राध्यापन की सुविधा ही प्रदान नहीं करते, प्रत्युत नव-चिन्तन के नवोन्मेष के भी चैतन्य केन्द्र हैं, जहाँ से नव-ज्ञान की रश्मियाँ विस्तीर्ण होती हैं। विश्वविद्यालयों की इस सार्थकता का परिज्ञान करते हुए पूज्य मातुश्री ने दिशा - बोध दिया कि इन सर्जना केन्द्रों के शीर्षस्थ नेतृत्व के साथ एक जीवन्त संवाद स्थापित किया जाना अपरिहार्य है। पूज्याश्री का यह सुस्पष्ट अभिमत रहा है कि इतिहास के वस्तुनिष्ठ सत्यों की पुनस्र्थापना एवं उनका पुनर्लेखन, भगवान ऋषभदेव एवं उनकी परम्परा के तीर्थंकरों द्वारा मानवीय कल्याण हेतु दिये गये अहिंसा, जीव - दया, साम्प्रादायिक सद्भाव, विश्वशांति, शोषणमुक्त समाज की रचना, पर्यावरण एवं प्रकृति संरक्षण को सुनिश्चित करना आदि ऐसे मसले हैं, जिनका हल खोजने के महायज्ञ में भारतीय मेधा के शीर्षस्थ नेतृत्व की समिधा अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि वे इस दिशा में अध्ययन / अनुसंधान प्रारम्भ करने/ विकसित करने में प्रेरक तथा मार्गदर्शक भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं। कलपति सम्मेलन - आयोजन - उपर्युक्त वैचारिक सन्दर्भ में दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध अर्हत् वचन, जनवरी 99 93
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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