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________________ बताया। प्रो. मिश्र की बात से सहमति व्यक्त करते हुए डा. अनुपम जैन ने बताया कि जैन धर्मावलम्बियों को नौकरी में आरक्षण, छात्रवृत्ति जैसी बातों के लिये अल्पसंख्यक की मांग न करनी चाहिये और न ही वे इस हेतु मांग कर रहे है। जैन समाज के तो सैकडों ट्रस्ट गुणात्मकता के आधार पर स्वयं छात्रवृत्तियाँ देते है। शोध संस्थान चलाते है। धर्मशालायें, पाठशालायें, औषधालय आदि जैन समाज द्वारा देश के कोने-कोने में चलाये जा रहे तथा वहां जाति, धर्म या सम्प्रदाय के आधार पर कोई भेद नहीं होता हम अल्पसंख्यक की मांग तो अपनी संस्कृति अपने धर्मायतनों की सुरक्षा के लिये अपनी शैक्षणिक संस्थाओं को बिना शासकीय हस्तक्षेप के स्वायत्तापूर्वक संचालित करने के उद्देश्य से कर रहे है। बहुसंख्यक समाज के राजनैतिक एवं सामाजिक दबाव से मुक्त रहकर हम अपनी परम्पराओं और अपने धर्म गुरूओं की निधि चर्या को सुनिश्चित कर सके यही अल्पसंख्यक स्वरूप मांगने के पीछे भाव है। पाठ्य पुस्तकों में संशोधन हेतु पूज्य माताजी की प्रेरणा से प्रो. बलबीर सिंह भसीन की एक सदस्यीय समिति का गठन किया गया। समापन सत्र में गणिनी ज्ञानमती शोधपीठ के नव नियुक्त निदेशक प्रो. आर.आर. नांदगांवकर, आयोजन समिति के सचिव एवं युवा विद्वान डा. अनुपम जैन सहित समस्त कुलपतियों, पूर्वकुलपतियों एवं पधारें 111 पर्यवेक्षक विद्वानों का स्मृति चिन्ह, प्रशस्ति पत्र एवं साहित्य प्रदान कर सम्मान किया। सम्मान समारोह में लंदन म्यूजियम में सुरक्षित भगवान ऋषभदेव एवं भगवान महावीर की द्वितीथीं मूर्ति एवं गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के लेमीनेटेड चित्र भी सभी को प्रदान किये गये। अनेक कुलपतियों ने अपनी प्रतिक्रिया मौखिक एवं पत्रों के माध्यम से व्यक्त करते हुए सम्मेलन को अत्यन्त सफल, सुनियोजित एवं दूरगामी प्रभावों वाला निरूपित किया है। जम्बूद्वीप के सुरम्य परिसर तथा आयोजन समिति के पदाधिकारियों की आत्मीयता एवं आतिथ्य की सभी ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। सम्मेलन की विस्तृत आख्या (Proceedings) शीघ्र प्रकाशित कर दी जायेगी। गणिनी ज्ञानमती शोधपीठ का शुभारंभ दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर (मेरठ) अपनी स्थापना के समय से ही शोध और अनुसंधान की गतिविधियों में संलग्न रहा है। जैन आगमों में उपलब्ध विवेचनों के आधार पर विश्व प्रसिद्ध जम्बूद्वीप रचना के निर्माण एवं 170 से अधिक सिद्धांत, भूगोल, खगोल, व्याकरण, गणित, उपन्यास, कथा, नाटक, बालोपयोगी ग्रंथों एवं अन्य विविध विषयक ग्रंथों के प्रकाशन के साथ ही यह संस्थान विशाल विद्वत शिक्षण प्रशिक्षण शिविरों, सेमीनारों, संगोष्ठियों, सम्मेलनों का आयोजन करता रहा। मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होने वाले इन सम्मेलनों की अकादमिक जगत में भूरि-भूरि प्रशंसा रही। सम्प्रति शोध गतिविधियों को अधिक समन्वित स्वरूप प्रदान किये जाने हेतु दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान के उदार आर्थिक सहयोग से गणिनी ज्ञानमती शोधपीठ की स्थापना का निश्चय किया गया जिसका शुभारंभ पूज्य, गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के जन्मदिन के पुनीत अवसर पर दानवीर श्रेष्ठी श्री महावीर प्रसाद जैन संघपति द्वारा भगवान ऋषभदेव के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर किया गया। शोधपीठ के भव्य भवन के निर्माण हेतु 1,06,565 = 00 रुपये की राशि श्री महावीर प्रसाद जैन, दिल्ली द्वारा प्रदान की गई तथा अन्य अनेक दानवीरों ने भी 6565 %D00 रुपये की राशि घोषित की। शोधपीठ को प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी का मार्गदर्शन एवं पीठाधीश क्षु. मोतीसागरजी का निर्देशन उपलब्ध रहेगा। कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्रकुमार जैन द्वारा शोधपीठ के निदेशक के रूप में विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलपति प्रो. आर.आर. नांदगांवकर की घोषणा का विद्वत समुदाय ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया। निदेशक मंडल में प्रो. सुरेशचन्द अग्रवाल, अध्यक्ष - विज्ञान संकाय, चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय मेरठ तथा डा. अनुपम जैन, संपादक अर्हत् वचन को मनोनीत किया गया। जैन विद्या के क्षेत्र में शोध करने वाले शोधार्थियों के आवेदन आमंत्रित है। 92 अर्हत् वचन, जनवरी 99
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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