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भगवान महावीर स्वामी ने की। पाठ्यपुस्तकों में संशोधन करके वास्तविक तथ्य प्रदर्शित करना चाहिये। आपने समस्त कुलपतियों को यह प्रेरणा दी कि वर्ष में एक बार विश्वविद्यालयों में भगवान ऋषभदेव समारोह नामक कार्यक्रम आयोजित किया जाए जिसमें जैन धर्म तथा ऋषभदेव से संबंधित व्याख्यानमाला, निबंध प्रतियोगिता, संगोष्ठी आदि का आयोजन हो। पूज्य माता जी की प्रेरणा से मंचासीन कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एम.एल. रंगा ने भगवान ऋषभदेव के निर्वाण दिवस 16 जनवरी 1999 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा संगोष्ठी के आयोजन की घोषणा की तथा इसका संयोजक डॉ. डी. सी. जैन (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय) को मनोनीत किया। इसी क्रम में प्रो. बलवीर सिंह भसीन ने मगध विश्वविद्यालय - बोधगया में, प्रो. पी.एन. मिश्र ने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय - इन्दौर में डा. प्रेमसुमन जैन ने सुखाडिया विश्वविद्यालय उदयपुर में, डा. भागचंद जैन "भास्कर' ने नागपुर विश्वविद्यालय - नागपुर में, डा. फुलचंद्र जैन 'प्रेमी' ने बनारस में तथा प्रो. सुरेशप्रसाद सिंह ने वीर कुंवरसिंह विश्वविद्यालय आरा में भगवान ऋषभदेव समारोह आयोजित करने की घोषणा की। प्रो. बलबीर सिंह भसीन ने यह घोषित किया कि एक सप्ताह में ही वह मानव संसाधन मंत्री से सम्पर्क कर पाठ्यपुस्तकों में निहित विसंगतियों को दूर करायेगें। पूज्य माताजी ने यह प्रेरणा दी कि निकट भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय स्तर कर कुलपति सम्मेलन आयोजित किया जाए जिससे सम्पूर्ण विश्व उनकी शिक्षाओं से सुपरिचित हो सके।
मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन में कुलपति प्रो. एम.एल. रंगा ने कहा कि हमने तीर्थंकरों के आदर्शों पर चलना बन्द कर दिया है और इसी कारण हम पथ भ्रष्ट हो गये। उन्होंने उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों में जैन तीर्थंकरों की शिक्षाओं एवं जैन साहित्य पर व्यापक शोध की आवश्यकता प्रतिपादित की एवं कहा कि कुरुक्षेत्र द्वारा होने वाली आगामी संगोष्ठी से इस कार्य को गति प्रदान की जायेगी। प्रो. रंगा ने आज के सत्र में कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर की प्रतिष्ठित शोध त्रैमासिकी अर्हत् वचन के 40वें अंक (वर्ष-10, अंक-4, अक्टूबर 98) का विमोचन किया। यह अंक कुलपति सम्मेलन के अवसर पर विशेष रूप से प्रकाशित किया गया। इसका विमोचन संपादक डा. अनुपम जैन, प्रो. सुरेशचन्द्र अग्रवाल एवं श्री जयसेन जैन द्वारा प्रो. रंगा के हाथों कराया गया एवं समागत समस्त विद्वानों को इसकी प्रतियाँ सादर नि:शुल्क उपलब्ध करायी गई।
आज के इस सत्र में प्रो. डी.पी. तिवारी मेरठ, मेजर बलबीर भसीन - गया एवं डा. नलिन के. शास्त्री बोधगया की त्रिसदस्यीय समिति द्वारा तैयार किये गये जम्बूद्वीप घोषणा पत्र को सदन के सम्मुख डॉ. अनुपम जैन द्वारा प्रस्तुत किया गया। वाचन के बाद कतिपय संशोधनोपरांत यह घोषणा पत्र सर्वानुमति से सदन द्वारा स्वीकृत किया गया जिसका पाठ अग्रांकित है। आज के इस सत्र में संयोजक मंडल के सभी सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किये जिसके अंतर्गत डा. फूलचन्द्र जैन 'प्रेमी', वाराणसी ने जम्बूद्वीप में महिला विश्वविद्यालय की स्थापना का सुझाव दिया। डा. भागचन्द जैन 'भास्कर', नागपुर ने कहा कि सभी विश्वविद्यालयों में जैन विद्या विभागों की स्थापना होनी चाहिये। प्रो. सुरेशचन्द्र अग्रवाल ने मेरठ वि.वि. के प्रतिनिधि के रूप में बोलते हुए इस आयोजन के विश्वविद्यालय के साथ संस्थान के 20 वर्षीय सतत सहयोग की प्रक्रिया में नींव का पत्थर निरूपित किया एवं कहा कि वे जैन नहीं है किन्तु माता ज्ञानमती जी भी मात्र जैन नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति की है। आपने कहा कि विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम में भगवान ऋषभदेव के पाठ को जोड़ना इतना आसान नहीं है। इसके लिये गंभीरतापूर्वक निरन्तर प्रयास करना होगा उन्होंने विश्वास दिलाया कि वे विश्वविद्यालय से इस संस्थान की नवगठित शोधपीठ को अतिशीघ्र मान्यता दिला सकेगें और जिस विश्वास के साथ पूज्य माताजी ने उन्हें दायित्व सौंपा है उसे वह पूर्ण कर पायेगें।
डा. शेखरचन्द जैन, अहमदाबाद ने कहा कि संस्कृति के आदि पुरुष भगवान ऋषभदेव से संबंधित पाठ को यदि विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रम में रखा जायेगा तो समाज पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा तथा साधुओं के लिये समाज में एक नया संदेश जायेगा। प्रो. पी. एन. मिश्र, इन्दौर ने कहा कि कुलपतियों से हम कुछ अधिक ही अपेक्षायें कर रहे हैं। उनकी भी कुछ सीमायें होती है और कुछ परेशानियाँ। उनको लांघा नहीं जा सकता। हमें पाठ्यक्रमों में संशोधन की अपेक्षा शोधकर्ताओं एवं विद्वानों से करना चाहिये। वे ही पुस्तकें लिखते हैं और पाठ्य पुस्तक लेखकों हेतु आधारभूत सामग्री एकत्रित करते हैं। आपने कहा कि जैन धर्मावलम्बी संख्या में भले ही कम हों किन्तु अत्यन्त परिपक्व वैज्ञानिक, उत्कृष्ट, दार्शनिक परम्परा से संबंद्ध है। उनका सम्पन्न साहित्य ही उनकी अमूल्य संपत्ति है। उन्होंने सुविधाओं की प्राप्ति हेतु अल्पसंख्यक की मांग को अनुपयुक्त
अर्हत् वचन, जनवरी 99
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