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श्री चंदनामती द्वारा की गयी हिन्दी टीका सहित सत्प्ररूपणा नामक प्रथम खण्ड का विमोचन किया गया एवं इसकी प्रतियाँ समागत समस्त कुलपतियों को प्रदान की गयी।
समारोह में श्री माणिकचन्द जैन पाटनी, राष्ट्रीय महामंत्री- महासमिति, श्री नेमीचंद जैन, विधायक-शुजालपुर, श्री निर्मलचंद जैन, सदस्य-वित्त आयोग, श्री अयूब अहमद अंसारी, मेयर - मेरठ आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
पूज्य ज्ञानमती माताजी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि 'जैन धर्म किसी व्यक्ति या जाति से जुड़ा नहीं है यह इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने वालों का धर्म है और परस्पर मैत्री करने की शिक्षा देता है। इसके तीर्थंकरों के समवशरण में पारंपरिक शत्रुता रखने वाले जीव भी बैरभाव भूलकर पास आ जाते है और आज यहाँ भारतीय संस्कृति का गौरव रखने वाले राजनेता और कुलपतिगण उपस्थित हैं। मुझे विश्वास है कि यहाँ उपस्थित सभी जन पारस्परिक चर्चा के माध्यम से अज्ञान के आवरण को दूर करेंगे तथा अनादि काल से चले आ रहे प्राकृतिक जैन धर्म की शिक्षाओं और इसके सांस्कृतिक अवदान को भली प्रकार रेखांकित करेंगे।' पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने भगवान ऋषभदेव एवं जैन धर्म की प्राचीनता के अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु 'अन्तर्राष्ट्रीय भगवान ऋषभदेव निर्वाण महामहोत्सव समिति' के गठन की घोषणा कर उसके अध्यक्ष पद पर श्री प्रदीपकुमारसिंह कासलीवाल, इन्दौर को मनोनीत किया।
उपस्थित राजनीतिज्ञों को संबोधित करते हुए आपने कहा कि - 'यह ठीक है कि धर्म में राजनीति नहीं होनी चाहिए किन्तु धर्म के बिना राजनीति बेमानी है।'
पूज्य माताजी की 65वीं जन्म जयन्ती को मनाने के लिये जन्मभूमि टिकैतनगर से पधारे 'भरतसेना' के सदस्यों ने एक सुन्दर समवसरण तैयार किया जिसमें सजे 65 दीपों का प्रज्वलन श्री प्रदीपकुमारसिंह कासलीवाल, इन्दौर ने किया। दिनांक 4.1098, अपरान्ह 4.30-6.00, द्वितीय सत्र
अध्यक्षता - प्रो. एस. रिन्पोछे, निदेशक - तिब्बती उच्च अध्ययन संस्थान, वाराणसी मंगलाचरण - प्रो. भागचंद 'भास्कर', अध्यक्ष - पाली प्राकृत विभाग, नागपुर वि.वि, नागपुर संचालन - प्रो. आर.आर. नांदगांवकर, पूर्वकुलपति-विक्रम वि.वि., उज्जैन वक्ता
प्रो. अलाउद्दीन अहमद, कुलपति-जामिया हमदर्द वि.वि., दिल्ली, . 'भगवान ऋषभदेव और पर्यावरण'। डा. शोभिता जैन, निदेशक- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त वि.वि., दिल्ली,
Jainism & Contemporary Environment'. . प्रो. अलाउद्दीन अहमद ने वेद और उपनिषदों के विवरण प्रस्तुत करते हुए यह सिद्ध किया कि भगवान ऋषभदेव ने ही जैन धर्म चलाया था। उनके द्वारा मानव कल्याण के लिये बताये गये उपदेश आज भी सामाजिक विघटन, शोषण, साम्प्रदायिक विद्वेष, आतंकवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकने में उतने ही प्रासंगिक है जितने पुरातन काल में थे। डा. शोभिता जैन ने कहा कि जैन जीवन पद्धति पर्यावरण के संरक्षण तथा आज की समकालीन समस्याओं के समाधान में नितांत उपयोगी एवं अनुकूल है। उनकी शिक्षाओं एवं सिद्धान्तों के बल पर आज भी जैन साधु बिना किसी दवा के ठीक हो जाते हैं, यह योग एवं साधना का ही प्रतिफल है। आपने आगे कहा कि आचार्य जिनसेन ने आदिपुराण में असि, मसि, कृषि आदि षक्रियाओं का वर्णन किया है। ऋषभदेव के पुत्र भरत ने मानव के आचार-विचार में उसे विभक्त करने हेतु चार वर्गों की स्थापना की थी और त्रस, स्थावर आदि की हिंसा न करने वालों को ब्राह्मण बनाया था, जैन लोग वनस्पति में प्राण मानते हैं, पांचों स्थावर अपने-अपने जीवन स्तर में जीव हैं, उनकी हिंसा नहीं करना, यही तो पर्यावरण है जो कि हमें भगवान ऋषभदेव ने प्रदान किया है, इत्यादि।
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अर्हत् वचन, जनवरी 99