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ही इस देश का नाम भारत पड़ा और यह भारत एक महान देश है। जिस प्रकार से किसी बगीचे में बहुत सारे फूल खिलते हैं, कुशल माली उन फूलों का गुलदस्ता बना देता है तो उसमें समस्त फूलों की मिलीजुली खुशबू आती है, उसी प्रकार इस भारत देश में जैन, बौद्ध, हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई आदि सभी जातियों की मिलीजुली सुगन्धी प्राप्त होती है।
पूज्य आर्यिका श्री अभयमती माताजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि जिन्होंने इस युग की आदि में जीने की कला सिखाई और षक्रियाओं का उपदेश दिया वे आदिनाथ भगवान देश की, . राष्ट्र की, कुल की रक्षा करें और पूज्य माताजी ने जो हमें मार्ग दिखाया है उसे हम पूरा करें और उनके आदर्शों का पालन करें।
विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे दि. जैन महासमिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रदीपकुमारसिंह कासलीवाल, इन्दौर ने उपस्थित विशाल जनसमुदाय एवं विद्वतजनों को संबोधित करते हुए कहा कि देश की दि. जैन समाज के एक मात्र प्रतिनिधि संगठन के अध्यक्ष के नाते मैं सर्वप्रथम तो दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान एवं चौ. चरणसिंह वि.वि. को इस बात के लिए बधाई देता कि उन्होंने यह सामयिक एवं अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन करने का निश्चय किया। मैं विनयावनत् हूँ माता ज्ञानमती जी के प्रति, जिन्होंने इस सामायिक एवं श्रेष्ठ आयोजन हेतु सम्यक् प्रेरणा दी। आज देश के बुद्धिजीवी वर्ग में इस बात की चर्चा है, कि जैन धर्मावलंबी अल्पसंख्यक की माँग क्यों उठा रहे है? मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जैन धर्मावलंबी किसी आर्थिक लाभ प्राप्त करने, नौकरियों में आरक्षण पाने, बैंकों से अधिक ऋण प्राप्त करने अथवा छात्रवृत्तियाँ लेने हेतु आरक्षण नहीं चाहते। हम तो चाहते हैं कि हमारी संस्कृति, हमारे तीर्थ, हमारी मूर्तियाँ, हमारे प्राचीन ग्रंथ, पांडुलिपियाँ, हमारी भाषा, हमारी परंपराएं और हमारे गुरूओं की निर्वाध चर्या सुनिश्चित हो। अपनी धार्मिक, शैक्षणिक संस्थाओं को हम बिना शासकीय हस्तक्षेप के स्वतंत्रता एवं स्वायत्तता के साथ चला सकें। हमारे धर्मगुरु, अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह का संदेश देने हेतु निर्बाध रूप से देश के प्रत्येक क्षेत्र में आ-जा सकें। इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु हम अल्पसंख्यक की माँग करते है। यहीं मैं यह कहना प्रासंगिक समझता हूँ कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय, देश के प्रसिद्ध दार्शनिकों और इतिहासकारों ने भी जैन धर्म को एक स्वतंत्र तथा पूर्ण धर्म स्वीकार किया है एवं 1991 की जनगणना के आधार पर जैन धर्मावलंबियों की संख्या 50 लाख से भी कम है। फिर भी जैनों को धार्मिक अल्पसंख्यक न मानना कहाँ तक न्यायोचित है? श्री कासलीवाल जी ने माननीय कुलपतियों से आग्रह किया कि वे अपने अधिकारों एवं व्यक्तिगत प्रभाव का उपयोग करते हुए देश के विभिन्न अंचलों में प्रचलित पाठ्य पुस्तकों में जैन धर्म के बारे में अनर्गल बातें
और तथ्यात्मक विसंगतियों को दूर कराने का कष्ट करें। आपने जैन समाज की ओर से उन्हें इस बात के लिए अग्रिम धन्यवाद दिया।
सांसद श्री धनंजयकुमार जैन ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैं दक्षिण भारत का होने के बावजूद भी हस्तिनापुर 2-3 बार आ चुका हूँ और राजेश पायलट उत्तर भारत के होने के बाद भी पहली बार आये हैं, यह आश्चर्य है। शोधपीठ का भवन शीघ्र पूर्ण हो, उसका लाभ शोधार्थियों को मिले, यही भावना है। अल्पसंख्यक के बारे में मैं कहता हूँ कि जैनों को अल्पसंख्यक दर्जा था और पुन: भी ऐसा ही होना चाहिये, मैं प्रयास अवश्य करुंगा।
मुख्य अतिथि के रूप में सांसद श्री राजेश पायलट ने कहा कि आज देश अजीब स्थिति से गुजर रहा है। यहाँ पर राजनैतिक चरित्र कमजोर होता जा रहा है इसीलिए राजनितिज्ञ आज जनता के आदर्श नहीं रह गए। फलत: हमें राजनैतिक लोगों से ज्यादा सामाजिक लोगों का सम्मान करना चाहिए। मेरी दृढ़ श्रद्धा है कि संतों के आशीर्वाद से ही देश की स्थिति सुदृढ़ हो सकती है। श्री पायलट एवं श्री धनंजय कुमार ने भगवान ऋषभदेव के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्जवलित कर सम्मेलन का शुभारंभ किया।
पूज्यनीय माताजी द्वारा रचित षट्खण्डागम् की सिद्धांत-चिंतामणि संस्कृत टीका एवं आर्यिका अर्हत् वचन, जनवरी 99