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मंगलाचरण के पश्चात् समागत मुख्य अतिथि, समारोह अध्यक्ष एवं समस्त विशिष्ट अतिथियों का स्वागत चौधरी चरणसिंह वि.वि. मेरठ के कुलपति प्रो. डी. पी. तिवारी एवं जम्बूद्वीप संस्थान के पदाधिकारियों ने प्रतीक चिन्ह एवं केशरिया अंगवस्त्र समर्पण तथा माल्यार्पण करके किया। इस शुभ अवसर पर कुलपति सम्मेलन समारोह को अर्धांजलि समर्पित करने वाले श्रेष्ठी श्री राजकुमार जैन (वीरा बिल्डस), दिल्ली का भव्य स्वागत मुख्य अतिथि श्री राजेश पायलट के करकमलों से किया गया तथा दिगम्बर जैन महासमिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रदीपकुमारसिंह कासलीवाल का स्वागत सांसद श्री धनंजयकुमार जैन के द्वारा हुआ।
समागत कुलपतियों का स्वागत करते हुए चौ. चरणसिंह वि.वि. के कुलपति प्रो. दुर्गा प्रसाद तिवारी ने कहा कि 'इस परिसर के विकास एवं व्यवस्था के लिए उत्तरदायी दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान की रूचि प्रारंभ से ही प्राचीन भारतीय भाषाओं के अध्ययन, ग्रंथों के अनुवाद कराने, तुलनात्मक अध्ययन एवं प्रकाशन में रही है तभी तो यह संस्थान अब तक 160 ग्रंथों की लाखों प्रतियों का प्रकाशन कर चुका है। 1980 से यह निरंतर राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन करता आ रहा है। इस संस्थान द्वारा जैन विद्याओं के अध्ययन हेतु जैसा उत्कृष्ट कार्य किया जा रहा है वैसा मैंने अन्यत्र कहीं नहीं देखा। सन् 1982 में जम्बूद्वीप ज्ञान ज्योति सेमिनार, 1985 में जैन गणित एवं त्रिलोक विज्ञान पर अन्तर्राज्यीय सेमिनार, 1992 में अन्तर्राष्ट्रीय चरित्र निर्माण संगोष्ठी, 1995 में आर्यिका ज्ञानमती साहित्य संगोष्ठी के आयोजन में वि.वि. के गणित विभाग के प्राध्यापक एवं विज्ञान संकायाध्यक्ष डा. सुरेशचंद अग्रवाल तथा इसी वि.वि. के शोध छात्र रहे डा. अनुपम जैन का विशेष सहयोग रहा है। मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता है कि डा. अनुपम जैन ने प्रो. अग्रवाल के निर्देशन में हमारे ही वि.वि. से जैन गणित के क्षेत्र में उत्कृष्ट शोध कार्य किया है। पारस्परिक सहयोग की इस लंबी श्रृंखला को स्थायित्व देने के लिए मेरी यह इच्छा है कि इस संस्थान की शोधपीठ को वि.वि. द्वारा गठित समिति की अनुशंसा पर शोध केन्द्र की मान्यता प्राप्त हो। वि.वि. द्वारा मान्य औपचारिकताओं को पूर्ण कर इस संस्थान की शोधपीठ कार्यपरिषद की सहमति से शीघ्र वि.वि. द्वारा मान्य शोधपीठ बन जाए इसमें मेरी सहमति है। मेरी यह भी भावना है कि इस वि.वि. के भावी विकास कार्यक्रमों के अंतर्गत यहाँ महिला अध्ययन का संस्थान विकसित हो एवं उसके अंतर्गत साहित्य के माध्यम से राष्ट्र एवं समाज की अप्रतिम सेवा करने वाली गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के साहित्यिक अवदान पर विशेष अध्ययन सम्पन्न हो। यदि जैन समाज का वि.वि. को सहयोग प्राप्त हुआ तो वि.वि. में जैन विद्याओं के अध्ययन एवं अनुसंधान के लिए एक स्वतंत्र केन्द्र स्थापित कर दिया जाए। संस्थान के प्रबन्धकों ने बताया है कि इस सम्मेलन में जैन धर्म की प्राचीनता, प्रासंगिकता, विश्व की वर्तमान समस्याओं के समाधान में जैन जीवन पद्धति की उपादेयता पर चर्चा की जाएगी। मुझे विश्वास है कि समागत विद्वत् जन इन प्रश्नों पर गंभीरता से कुछ ठोस निष्कर्ष निकालेंगे।
माननीय कुलपति जी के इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए संघपति लाला महावीर प्रसाद जैन ने शोधपीठ के सर्वसुविधायुक्त भवन के निर्माण हेतु 1,06,565 रु. के अनुदान की घोषणा की एवं इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए अनेक श्रेष्ठियों ने 6565 रू. देने की स्वीकृति दी। लाला महावीरप्रसादजी जैन दिल्ली ने दीप प्रज्वलित कर नवस्थापित शोधपीठ का औपचारिक शुभारम्भ किया।
प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा के आदि प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव अपनी पुत्री ब्राह्मी और सुन्दरी को अंक विद्या और लिपि विद्या लिखकर विद्या का शुभारम्भ कर रहे हैं। (भगवान ऋषभदेव की मूर्ति ब्राह्मी और सुन्दरी को विद्याध्ययन कराते हुए वहाँ विराजमान थी) अत: कुलपिता विराजमान हैं। कुलगुरु के रूप में साक्षात सरस्वती की प्रतिमूर्ति पूज्य ज्ञानमती माताजी विराजमान हैं और दूर-दूर से आये हुए कुलपति सभा में विद्यमान हैं। अत: त्रिवेणी का संगम यहाँ प्राप्त हुआ है। आदिब्रह्मा के पुत्र भरत के नाम पर
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अर्हत् वचन, जनवरी 99