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प्रो. एस. रिन्पोछे ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में समय के महत्व को प्रतिपादित करते हुए यह आशा व्यक्त की कि सम्मेलन में समागत बन्धु समय का सदुपयोग करते हुए सम्मेलन के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु सार्थक प्रयास करेंगे। इस सत्र में प्रो. एस.के. मिश्रा, कुलपति - महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही। उनका आलेख जैन धर्म एवं शिक्षा प्रोसिडिंग्स में अन्य अनेक आलेखों के साथ प्रकाशित किया जा रहा है।
डॉ. अनुपम जैन ने अध्यक्ष प्रो. रिपोन्छे, संचालक प्रो. नांदगांवकर सहित सभी वक्ताओं के प्रति आभार ज्ञापित किया। दिनांक 4.10.98, रात्रि 7.30-9.00, तृतीय सत्र
अध्यक्षता - प्रो. विद्यावती, कुलपति - काकतिया वि.वि., वारंगल (आंध्र प्रदेश) वि. अतिथि - प्रो. पन्नालाल पापडीवाल, अध्यक्ष - महाराष्ट्र प्रान्तीय तीर्थ क्षेत्र कमेटी, पैठण
(महा.) मंगलाचरण - डॉ. शेखरचन्द्र जैन, सम्पादक - तीर्थंकर वाणी, अहमदाबाद संचालन - प्रो. शुभचन्द्रा, जैन विद्या विभाग, मैसूर वि.वि, मैसूर वक्ता - डा. अनुपम जैन, गणित विभाग - होल्कर स्वशासी विज्ञान महाविद्यालय, इन्दौर,
'प्रास्ताविक वक्तव्य प्रो. आद्या प्रसाद मिश्र, कुलपति - महर्षि महेश योगी वि.वि., जबलपुर, 'अयोध्या नगरी में अवतरित भगवान ऋषभदेव' प्रो. एस.एन. पी. सिन्हा, पूर्वकुलपति - पटना वि.वि., पटना,
'प्रथम तीर्थकर भगवान ऋषभदेव - एक ऐतिहासिक महापुरुष' डा. अनुपम जैन ने अपने प्रस्ताविक वक्तव्य में दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर की अकादमिक उपलब्धियों की चर्चा करते हुए बताया कि पाठ्य पुस्तकों में निहित जैन धर्म विषयक भ्रांतियों के निरसन, वर्तमान में कार्यरत जैन शोधपीठों के सम्मुख उपस्थित समस्याओं के निराकरण, नवीन जैन अध्ययन केन्द्रों की स्थापना, तथा भगवान ऋषभदेव की शिक्षाओं के व्यापक प्रचार आदि महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श एवं समस्याओं के व्यावहारिक समाधान खोजने के लिये यह सम्मेलन आयोजित किया गया है। इस सम्मेलन के माध्यम से समागत कुलपतियों के व्यापक शैक्षणिक तथा प्रशासनिक अनुभव के आधार पर जैन विद्या के अध्येताओं एवं जैन विद्वानों के सम्मुख आने वाली व्यावहारिक समस्याओं के समाधान खोजे जा सकते हैं।
प्रो. आद्या प्रसाद मिश्र ने कहा कि भगवान ऋषभदेव ने समस्त विद्याओं एवं कलाओं का प्रारंभ किया। आज मानव उसी के आधार पर विभिन्न माध्यमों से जीवन व्यतीत कर रहा है। उन्होंने कहा कि ऋषभदेव का जन्म करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ था एवं उन्होंने कर्मों पर विजय प्राप्त कर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर होने का सौभाग्य प्राप्त किया। डा. एस.एन.पी. सिन्हा ने कहा कि भगवान ऋषभदेव का श्रीमद् भागवत आदि अनेक ग्रंथों में वर्णन आता है। इसलिये भगवान ऋषभदेव एक ऐतिहासिक महापुरुष हुए हैं। आपने कहा कि जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा शाकाहार का उपदेश देकर लोगों को सदाचार की ओर प्रेरित किया है। जिस प्रकार से संसार में आकाश से बड़ी कोई वस्तु नहीं है उसी प्रकार अहिंसा सिद्धान्त से बढ़कर कोई धर्म नहीं है जिसे जैनधर्म ने बड़ी प्रधानता से प्रतिपादित किया है। इसीलिये इस धर्म में वैर को स्थान न देकर क्षमा को धारण करने का उपदेश दिया गया है। खम्मामि सव्व जीवाणं सव्वे जीवा खम्मतु मे, मित्ती में सव्व भूदेसु वैरं मझं ण केणवि ... का सन्देश इस धर्म में है।
सत्र के विशिष्ट अतिथि डॉ. पन्नालाल पापड़ीवाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज तक जो कार्य अन्य साधु नहीं कर सके वह पू. माताजी ने करके दिखाया है। जैन समाज में
अर्हत् वचन, जनवरी 99