SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 8
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ से प्रचारित - प्रसारित करने हेतु ज्ञानपीठ द्वारा स्वयं के संगणन केन्द्र के विकास का निश्चय किया गया। इस केन्द्र की स्थापना कर 2 संगणकों (Computers), मुद्रकों (प्रिन्टरों) आदि की स्थापना की जा चुकी है। फरवरी के प्रथम सप्ताह से E. Mail आदि की सुविधायें भी प्रारंभ हो जायेंगी। इसकी स्थापना में प्रदत्त सहयोग हेतु हम डा. डी.के. बोबरा, अमेरिका एवं उनके परिवार के सभी सदस्यों के आभारी प्रकाशित जैन साहित्य - सूचीकरण परियोजना - गत 100-150 वर्षों में विपुल परिमाण में जैन साहित्य प्रकाशित हुआ है। इसके बावजूद भी आज ग्रंथ भंडारों में सैकड़ों ग्रंथ अप्रकाशित हैं। यह समाज के लिए अत्यंत दुःखद है कि आज बीसवीं सदी के अंतिम वर्ष में भी हम न तो अपने ग्रंथ भंडारों का पूर्णत: सर्वेक्षण करा सके एवं न उनका सूचीकरण। इसी कारण आज हमारे पास पाण्डुलिपि के रूप में सुरक्षित ग्रंथों की सूची भी उपलब्ध नहीं है। जब भी किसी नए भंडार का सूचीकरण होता है, तब यह समस्या आती है कि कितने ग्रंथ अद्यतन अप्रकाशित है एवं कितने अप्रकाशित। इसका निर्धारण हो जाने पर सीमित मात्रा में अद्यतन अप्रकाशित ग्रंथों का संरक्षण प्राथमिकता के आधार पर किया जा सकता है। शोध एवं अनुसंधान कार्य में लगे विद्वानों के लिए प्रकाशित साहित्य की जानकारी भी अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसके माध्यम से ही वे पुनरावृत्ति के दोष एवं निरर्थक श्रम से बच पाते हैं। लगभग 50 वर्ष पूर्व प्रकाशित ग्रंथों में भी आज अनेकों अनुपलब्ध हैं एवं नई पीढ़ी को उनके नाम भी ज्ञात नहीं हैं। किसी भी नये अप्रकाशित ग्रंथ के सम्पादन/प्रकाशन के समय उसकी अन्य पांडुलिपियों की खोज भी नितान्त आवश्यक होती है। सम्यक जानकारी के अभाव में बहुत श्रम एवं धन अन्य पांडुलिपियों की खोज में व्यर्थ चला जाता है। शोधार्थियों की सुविधा तथा प्रकाशित/अप्रकाशित साहित्य के संरक्षण की प्रक्रिया के प्रथम चरण में प्रकाशित जैन साहित्य के सूचीकरण की परियोजना कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ द्वारा बनाई गई है। सत्श्रुत प्रभावना ट्रस्ट, भावनगर द्वारा भी इसी प्रकार की असुविधाओं का गत 2 वर्षों से अनुभव किया जा रहा था। उन्होंने इसके समाधान हेतु अनेक संस्थाओं एवं विद्वानों से सम्पर्क किया। सम्पर्क के क्रम में उन्होंने कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर से भी पत्राचार द्वारा सम्पर्क किया एवं ज्ञानपीठ के आमंत्रण पर चर्चा हेतु ट्रस्ट के प्रतिनिधि के रूप में श्री हीरालाल जैन, भावनगर नवम्बर 98 में पधारे। इस चर्चा के माध्यम से वर्तमान योजना के प्रारूप को अंतिम रूप दिया गया। सत्श्रत प्रभावना टस्ट, भावनगर एवं कन्दकन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर के संयक्त तत्वावधान में कन्दकन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर द्वारा संचालित इस परियोजना का क्रियान्वयन 1 जनवरी 99 से प्रारम्भ किया जा चुका है। हमें ज्ञात है कि पूर्व में भी कुछ विद्वानों एवं संस्थाओं ने एतद् विषयक प्रयास किये हैं किन्तु प्रकाशन का कार्य इतनी तीव्र गति से बढ़ा है कि वे प्रयास अब नाकाफी हो गये तथा इस कार्य को बीच में ही छोड़ देने के कारण परिणाम अधिक उपयोगी न बन सके। हमारी योजना के अनुसार हम इस परियोजना के प्रतिफल को इन्टरनेट एवं प्रिन्ट मीडिया द्वारा सर्वसुलभ करायेगें। मात्र इतना ही नहीं कुन्दुकुन्द ज्ञानपीठ इस सूची का निरन्तर परिवर्द्धन करता रहेगा एवं जिनवाणी के उपासकों हेतु यह सदैव सुलभ रहेगी। हमारा अनुरोध है कि - 1. जिन संस्थाओं ने पूर्व में प्रकाशित जैन साहित्य के सूचीकरण का प्रयास किया है वे अपनी सूचियों की छाया प्रतियाँ या फ्लापियाँ उपलब्ध कराने का कष्ट करें। छाया प्रतियों (फोटोकॉपी) या फ्लापियों का व्यय देय तो रहेगा ही, उनके सहयोग का सादर उल्लेख भी भावी प्रकाशन में किया जायेगा। 2. समस्त ग्रंथ भंडारों/पुस्तकालयों के प्रबंधकों से भी अनुरोध है कि वे अपने संकलनों की परिग्रहण पंजियों (Accession Registers) की छाया प्रतियाँ हमें भिजवाने का कष्ट करें। एतदर्थ शुल्क ज्ञानपीठ अर्हत् वचन, जनवरी 99
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy