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सम्पादकीय
अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर
सामयिक सन्दर्भ
सदस्य
दूसरे दशक की पहली दहलीज पर खड़े होकर हम अपने विज्ञ लेखकों एवं सुधी पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। सितम्बर 88 में प्रवेशांक के प्रकाशन से प्रारंभ यह यात्रा 40 पड़ावों को पार कर आज इस मुकाम पर है कि हम 11 वें वर्ष का प्रथम अंक 41 वें अंक के रूप में आपको समर्पित कर रहे हैं। आहलाद के ये क्षण आये हैं वर्ष 1999 के शुभारंभ में, फलत: हम ईसवी नव वर्ष की शुभकामनायें भी अपने पाठकों को प्रेषित कर रहे हैं। 1999 उनके लिए मंगलमय हो, यश एवं श्री वृद्धिदायक हो, यही मंगलकामना है। निदेशक एवं सम्पादक मण्डल का पुनर्गठन
गत 20 दिसम्बर को कुन्दुकुन्द ज्ञानपीठ परामर्शदात्री समिति की बैठक विख्यात शिक्षाविद प्रो. अब्दुल असद अब्बासी, पूर्व कुलपति - देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। इसकी अनुशंसा के आधार पर ज्ञानपीठ के अध्यक्ष श्री देवकुमारसिंह कासलीवाल ने कार्य परिषद की सहमति से आगामी 2 वर्षों (1999 एवं 2000) हेतु निम्नवत ज्ञानपीठ के निदेशक मंडल का निम्नवत गठन किया है। अध्यक्ष : प्रो. नवीन सी. जैन, इन्दौर
: पं. नाथूलाल जैन शास्त्री-इन्दौर, प्रो. आर.आर. नांदगांवकर - नागपुर, प्रो. ए.ए. अब्बासी-इन्दौर,
प्रो. नलिन के. शास्त्री-बोधगया (बिहार), प्रो. सुरेशचन्द्र अग्रवाल- मेरठ सदस्य - सचिव : डॉ. अनुपम जैन, इन्दौर
अपने सुयोग्य मार्गदर्शन एवं सक्रिय सहयोग से कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ को वर्तमान स्थिति तक पहुँचाने वाले पूर्ववर्ती निदेशक मण्डलों के सभी सदस्यों के प्रति हम ज्ञानपीठ की ओर से कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं एवं आशा करते हैं कि उनका संरक्षण एवं सहयोग भविष्य में भी प्राप्त होता रहेगा। नवगठित मंडल का मार्गदर्शन एवं सहयोग हमें प्रगति के राजमार्ग पर ले चलेगा जिससे हम जैन विद्याओं के अध्ययन/अनुसंधान को गतिमान करने के लक्ष्य की ओर द्रुतगति से बढ़ सकें।
जनवरी 99 से ही आपकी इस प्रिय पत्रिका के सम्पादक मंडल का भी पुनर्गठन किया गया है। आगामी 2 वर्षों (1.1.1999 - 31.12.2000 तक) हेतु मनोनीत सम्पादक मण्डल की सूची पृ. -2 पर प्रकाशित है। हमें विश्वास है नवगठित सम्पादक मण्डल से दिशा लेकर हम अर्हत् वचन की अधिक सार्थक भूमिका सुनिश्चित कर सकेगें। गत दशक की यात्रा में अर्हत् वचन की प्रतिष्ठा एवं लोकप्रियता दोनों बढ़ी है फलत: हमसे अपेक्षायें भी बढ़ी हैं। बदली परिस्थितियों में समस्यायें एवं चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं किन्तु इन सबके बीच भी अपने दायित्व का बोध रखते हुए जिनवाणी की निष्ठापूर्वक सेवा करने हेत हम सतत प्रयत्नशील रहेगें। पाठकों से अपेक्षा है कि वे सदस्यता वद्धि में हमें अपना सक्रिय सहयोग प्रदान करें। सदस्यता वृद्धि हेतु ज्ञानपीठ की कार्यपरिषद ने सदस्यता शुल्क को 10 वर्ष पूर्व के स्तर पर ही रखते हुए नि:शुल्क वितरण को पूर्णत: प्रतिबंधित कर दिया है। सभी के सहयोग से प्रसार संख्या में वृद्धि कर हम इसके आधार को व्यापक एवं सुदृढ़ कर सकेगें।
सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति के वर्तमान युग में देश - विदेश के शोध केन्द्रों / शोध संस्थाओं/विश्वविद्यालयों से सतत, सहज एवं त्वरित सम्पर्क बनाये रखने हेतु एवं संस्थान की शोधों/मान्यताओं को व्यापक रूप
अर्हत् वचन, जनवरी 99