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पत्र, रसीदें जो 1925 से 1940 के दरम्यान की हैं, सुरक्षित भी हैं। उसके बाद काम ठंडा पड़ गया। फिर 1960-65 के आस- पास पं. बाबूलालजी जमादार एवं साहू शान्तिप्रसादजी के प्रयासों से काम ने एक बार फिर जोर पकड़ा। रायबहादुर हरखचन्द पांड्या उनके साथ रहे ।
अनुपम तब तो काफी काम हुआ होगा ?
मुनिश्री हाँ, हुआ था, लेकिन सराक बन्धुओं विशेषतः युवाओं से जुड़ाव न हो पाने के कारण जमादारजी के प्रयासों से जो गति आई, वह स्थायी न रह सकी, क्योंकि वह प्रयास मात्र कुछ सम्पन्न लोगों के बीच में ही रह गया।
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अनुपम मेरे मन में एक जिज्ञासा है। जब बैजनाथजी सरावगी से लेकर पं. जमादारजी तक इतने लोगों ने काम किया तो उस कालखंड में समय समय पर बहुत सी पुस्तकें, लेख आदि भी लिखे गये होंगे। क्या उनका कोई व्यवस्थित संकलन एवं प्रकाशन हुआ है ?
मुनिश्री
मैंने प्रेरणा दी थी कि जैन गजट, जैन सन्देश आदि के पुराने अंकों में जो लेख छपे हैं, उनको प्रकाशित किया जाये और मुझे खुशी है कि 'सराकोत्थान प्रेरणा के स्वर' पुस्तक, जो आचार्य शान्तिसागर छाणी ग्रन्थ माला के अन्तर्गत छपी है, में इनका संकलन हुआ है। आप देख सकते हैं, लेकिन वह पूरा नहीं है।
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अनुपम मैं देख रहा हूँ कि आप सराक आन्दोलन के प्रारम्भिक चरण से जुड़े जो नाम बता रहे हैं, वे सभी जैन समाज के सुधारवादी आन्दोलन के शीर्षस्थ पुरुष हैं। ब्र. शीतलप्रसादजी, श्री गणेशप्रसादजी वर्णी, पं. बाबूलालजी जमादार, साहू शान्तिप्रसादजी आदि सभी जैन समाज की प्रगतिशील विचारधारा के पोषक एवं सुधारवादी आन्दोलन के अग्रणी पुरुष हैं। क्या यह महज संयोग है या कोई सुविचारित नीति या कारण ?
मुनिश्री यह एक संयोग हो सकता है, किन्तु वर्तमान में तो पूरी जैन समाज जुड़ी
है। आप अ. भा. दिगम्बर जैन सराक ट्रस्ट को ही देख लीजिये । (साहू अशोकजी इसके अध्यक्ष हैं ) मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि ऐसे लोग जो धार्मिक क्रियाओं में कम जुड़े हैं, वे भी मानव सेवा के इस काम में पूरी तरह लग गये हैं। इसमें प्रगतिशील आर्षपरम्परानुयायी जैसा कोई प्रश्न नहीं है।
या
अनुपम
रारा कोन्थान
के स्वर
और साधु संस्था का भी
वर्षायोग में साहू अशोककुमारजी उपाध्यायश्री से विचार विमर्श करते हुए
अर्हत् वचन, जनवरी 99