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वर्ष - 11,
अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर उपाध्याय मुनि श्री ज्ञानसागरजी से साक्षात्कार
अनुपम आज सम्पूर्ण देश में से बचे समय को शायद आप . प्रेरणा कब एवं कहाँ मिली ?
अंक:
- 1, जनवरी 99, 55-60
डॉ. अनुपम जैन - नमोस्तु महाराज जी । नवम्बर 1995 में पत्रकार सम्मेलन में आपने हम सब पत्रकारों को सराकोत्थान के कार्य में अपने कर्तव्य को निभाने की प्रेरणा दी थी। तभी से मन में विचार चल रहा था। पुण्योदय से आज पुनः भगवान चन्द्रप्रभु के इस अतिशय क्षेत्र पर आपके दर्शन का सुयोग बना है। ब्र. भाई अतुलजी ( पास में बैठे) के सतत सम्पर्क एवं प्रेरणा की भी इसमें महती भूमिका है। यदि आप अनुमति दें तो मैं कुछ जिज्ञासायें आपके सम्मुख प्रस्तुत करूँ। उपाध्याय मुनि श्री ज्ञानसागरजी
अवश्य। हमें खुशी होगी।
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तिजारा 8.12.98
■ अनुपम जैन*
मुनिश्री वर्ष 1991 में हम लोग शिखरजी में थे, उन्हीं दिनों वहाँ आये कुछ भक्तों एवं विद्वानों ने यह प्रसंग उठाया कि इस क्षेत्र में सराक बन्धु रहते हैं। पंडित बाबूलालजी जमादार ने उनके उत्थान हेतु काफी काम किया है। बस हमारे मन में अपने इन बन्धुओं के उत्थान हेतु कुछ करने की रूचि जगी और
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आपने सराकोत्थान का एक आन्दोलन चला रखा है। साधना इसी चिन्तन में लगाते हैं। कृपया बतायें कि आपको इसकी
अनुपम तो क्या उस क्षेत्र में आपने अपने मन से ही विहार किया ? अथवा आपके गुरु की भी इस आदिवासी, अपरिचित, दिगम्बर मुनि की चर्या से अनभिज्ञ क्षेत्र में विहार
की अनुमति थी। मुनिश्री अनुमति थी। मेरे गुरु आचार्य श्री सुमतिसागरजी महाराज की अनुमति मैंने ली थी एवं मेरे अनुरोध पर उन्होंने स्वयं सराक क्षेत्र में जाकर अपने साधर्मी बन्धुओं के कष्टों, उनकी भक्ति एवं धर्म की दृढ़ता को देखा। स्थान की आवश्यकता को देखकर उन्होंने न केवल अनुमति दी, अपितु आशीर्वाद सहित प्रेरणा भी दी।
अनुपम आप जमादारजी के बारे में कुछ कह रहे थे।
प्रारम्भ में बैजनाथजी
मुनिश्री सरावगी, ब्र. शीतलप्रसादजी, श्री गणेशप्रसादजी वर्णी आदि ने बहुत काम किया। उनके प्रयास से कुछ ग्रामों में भगवान पार्श्वनाथ की मूर्तियाँ भी स्थापित की गईं। रांची के पास अगासिया एक गांव है वहाँ काम शुरु हुआ। रांची के पास के एक ग्राम ( शायद रोहिड़ी बाजार) में एक सप्तम प्रतिमा धारी ब्रह्मचारी थे। उन्होंने बहुत काम किया। उनके कुछ
सम्पादक - अर्हत् वचन, डी- 14, सुदामानगर, इन्दौर-452009
सराक क्षेत्र में उपाध्याय श्री ज्ञानसागरजी अपने गुरु आचार्य श्री सुमतिसागरजी महाराज के साथ