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________________ माना कि इस जहान को गुलशन नाकरसके मुनिश्री - हाँ, सभी साधुओं का इस कार्य में पूरा आशीर्वाद है। अनुपम - मैं एक बार फिर पीछे जाना चाहता हूँ। आपने इस कार्य को कब एवं क्यों हाथ में लिया? मुनिश्री - 1991 में हम लोग शिखरजी में थे। शायद মাই কল কর তাই এই নিজ মনে मार्च के आस-पास का समय था। डॉ. रमेशचन्दजी बिजनौर एवं अन्य कई विद्वानों ने वहाँ सराक बन्धुओं के बारे में बताया एवं कहा कि इस क्षेत्र में सराक बन्धु रहते हैं। उन्होंने उनके उद्धार के प्रयास करने का निवेदन किया। ज्ञात हुआ कि लगभग 30 साल पहले दिगम्बर - श्वेताम्बर ने उपाध्याय मुनिश्री ज्ञानसागरजी नित्य कार्य हेतु विहार करते हुए मिलकर कोई बड़ा सराक सम्मेलन किया था, उसमें सभी सराक आये थे। 1983 में ईसरी में आचार्य श्री विद्यासागरजी के सान्निध्य में सराक सम्मेलन हुआ था। सुयोग से हजारीबाग में पंचकल्याणक होना था। बस उसमें सराक सम्मेलन रखा। इसके बाद हमने तमाम प्रतिकूलताओं, चर्या की जटिलता, साधनों के अभाव के बावजूद सराक ग्राम - तडाई में चातुर्मास वर्तमान सराक गांव का एक दृष्य (1993) का निर्णय कर लिया। जिन सराक बन्धुओं ने धर्मान्धता एवं धार्मिक विद्वेष हेतु अनेक प्रकार के अत्याचार सहे, शोषण एवं उत्पीड़न सहे, खेती - बाड़ी, फलता-फूलता व्यापार, घर - मकान, सब कुछ छोड़ा, किन्तु अपना धर्म नहीं छोड़ा। अपने धर्म एवं संस्कारों को बचाने हेतु उन्होंने जाकर जंगलों में शरण ली. नये आश्रय स्थल खोजे एवं येन-केन-प्रकारेण जीवन यापन किया। सराक क्षेत्र में बने भव्य जिनालयों के खण्डहर, प्राचीन मूर्तियाँ एवं अन्य पुरावशेष इसके प्रमाण हैं। ऐसे सराक बन्धुओं के कल्याण हेतु प्रयास करना सभी का धर्म है। अनुपम - शायद सराक बन्धुओं के भाग्योदय का समय है, तभी आपने इस विषय को इतनी प्रमुखता देकर कार्य हाथ में लिया है? अर्हत् वचन, जनवरी 99 57
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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