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________________ द्वारा बालू से बनाई गई थी। आचार्य माधनंदी और शालिवाहन राजा का भी इस क्षेत्र से जुड़ाव हुआ था। खरदूषण का काल रामचन्द्र का काल था और भगवान मुनिसुव्रत के तीर्थ काल में ही रामचन्द्र का काल जैन संदर्भो से ठहरता है। इस बात को अनदेखा करना ठीक नहीं होगा। भद्रबाहु के दक्षिण गमन के माध्यम से यहाँ कुछ ही संदर्भो संकेतों पर विचार करने का प्रयत्न किया गया है - आशा है भविष्य में शोधार्थी कई नये संदर्भ जैन इतिहास को देंगे। श्री सुब्रमण्यम ने अपनी पुस्तक 'तिरुवल्लुवार एण्ड हिज तिरूक्कुराल' में पृष्ठ 63 पर स्पष्ट किया है कि उनके नेता भद्रबाहु इस बात को जानते थे कि वहाँ एक उन्नत देश है, मुख्यत: उन लोगों का वहाँ निवास है जो ऋषभ की अहिंसा पर विश्वास रखते हैं तथा उन्हें अपने. संघ के लिए लोगों का सहयोग प्राप्त होगा। इस विश्वास के बिना इतने बड़े जैन संघ का दक्षिण गमन समझना कठिन होगा। . इतिहास एवम् संदर्भात्मक पुराणों से यह बिलकुल साफ है कि तमिल जैन आदर्शों से महावीर के समय से परिचित थे। इस काल में श्रमण चिन्तन का उत्तर से दक्षिण तक तथा पूर्व से पश्चिम तक जो फैलाव नजर आता है उसका श्रेय भद्रबाह - चन्द्रगुप्त और विशाखाचार्य को जाना चाहिये। तीसरी शताब्दी ई. पूर्व जो पुल भद्रबाहु ने विंध्याचल और सत्पुड़ा को पार कर दक्षिण मुखी बनाया वह समविचारों वाले लोगों को जोड़ने का कार्य था। संभवत: इसी पुनर्गठन का परिणाम था कि दक्षिण ने समंतभद्राचार्य, कन्दकन्दाचार्य, अमतचन्द्राचार्य से बहती हई चरित्र प्रधान मनीषियों, चिंतकों की एक न टूटने वाली लंबी परंपरा जैन संघ को दी। भद्रबाहु का काल संभावनाओं, परिवर्तन तथा गतिशीलता का अद्भुत उदाहरण है। भद्रबाहु केवल जैनाचरण के मर्मज्ञ नहीं थे बल्कि वे ऐसे शक्तिपुंज थे, जिसने काल के थपेड़ों से बिखरे जैन समूह को एक कड़ी में बांधा। आम्नाय व पद्धति का विभाजन होता रहा है और होता रहेगा - किन्तु 'जैन' चिन्तन के प्रति यदि हम निर्विवाद रूप से जुड़े रहे तो प्राणीमात्र के अस्तित्व को फहराने वाली ऋषभ पताका लहराती रहेगी। सन्दर्भ स्थल : 1. वृहत कथा कोष, सं. 143, कवि हरिषेण (931 ई.), सिरिचंद कृत कहकोसु, नेमीदत्तकृत आराधना कथा कोष 2. रामशरण शर्मा, प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थायें, पृ. 263 3. प्रो. ए. चक्रवर्ती, 11-12 जैन लिटरेचर इन तमिल 4. वही पृ. 13 5. श्रीमद्भागवत, पंचम स्कन्ध, छठा अध्याय 6. बलभद्र जैन, जैन धर्म का प्राचीन इतिहास, पृष्ठ 78 7. श्री सुब्रमण्यम, तिरुवल्लुवार एण्ड हिज तिरुक्कुराल, पृ. 63 प्राप्त - 31.7.98 AA अर्हत् वचन, जनवरी 99
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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