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अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर
वर्ष - 11, अंक - 1, जनवरी 99, 45 - 48 तीर्थंकर दिव्यध्वनि की भाषा
- नाथूलाल जैन शास्त्री*
दिव्यध्वनि और प्राणिमात्र में मैत्री आदि 14 अतिशय तीर्थंकर केवली के देवकृत । बताये हैं।
आचार्य कुन्दकुन्ददेव कृत 'दर्शन प्राभृत' 1 की संस्कृत टीका में केवलज्ञान के चतुर्दश अतिशयों में उक्त दिव्यध्वनि को सर्वार्द्धमागधी भाषा कहा है। उसके अर्थ में मगधदेव के सन्निधान होने पर तीर्थंकर की वाणी अर्द्ध मगध देश भाषात्मक एवं अर्द्ध सर्वभाषात्मक परिणत होती है।
मैत्री के भाव में वहीं स्पष्टीकरण किया गया है कि समवसरण में सर्व जनसमूह मागध, प्रीतंकर देव कत अतिशय के कारण मागध भाषा में परस्पर बोलते हैं और मित्ररूप में व्यवहार करते हैं।
'तिलोयपण्णत्ती' आदि के अनुसार तीर्थंकरों की दिव्यध्वनि तालु, दंत, ओष्ठ के हलन - चलन बिना होती है।
हम पूजा में पढ़ते हैं - 'ओंकार ध्वनि सार द्वादशांगवाणी विमल' 21 मूल में केवली के समस्त शरीर से 'ओम्' ध्वनि अनक्षरात्मक शब्द तरंग रूप संप्रेषण द्वारा बिना इच्छा के मेघगर्जना के समान श्रोताओं के कर्ण में प्रवेश करते समय उनकी योग्यतानुसार उनकी भाषा रूप अक्षरात्मक होकर परिवर्तित होती है। इसमें मागध देवों का सन्निधान रहता है जैसा कि उक्त दर्शनप्राभृत टीका में बताया गया है। साथ ही केवली का अतिशय तो है ही। भाषा के प्रसार में देव सहयोग प्रदान करते रहते हैं।
दिव्यध्वनि तीर्थंकर नाम कर्मोदय के कारण कण्ठ, तालु आदि को प्रकंपित किये बिना शब्द वर्गणावे कंपन के साथ ध्वनि होती है जो पौद्गलिक है। काययोग (वचन) से आकृष्ट पुद्गल स्कंध स्वयं शब्द का आकार लेते हैं याने भाषा रूप में परिणमन करते हैं। तीर्थंकर की ध्वनि में ऐसी स्वाभाविक शक्ति होती है जिसमें वह अठारह महाभाषा एवं सात सौ लघुभाषा में परिणत होती है। साथ ही समस्त मनुष्यों, देवों एवं पशु- पक्षियों की संकेतात्मक भाषा में परिवर्तित हो जाती है ।
ऊपर जो तीर्थंकर वाणी को अर्द्ध मागधी कहा है, यद्यपि उसमें मगध शब्द का संबंध देवों को बता दिया गया है। साथ ही मगध देश की भाषा का भी उल्लेख किया गया है जिसमें अन्य अठारह देशी भाषाओं का मिश्रण है।
'अठ्ठारस देशी भाषा नियमं वा अद्धमागहम्' अर्थात् अठारह देशी भाषाओं का मिश्रण अर्द्धमागधी है। आचार्य जिनसेन आदि ने इसे सर्वभाषात्मक कहा है। हमारे यहाँ लिखने का अभिप्राय यह है कि 'अर्हत् वचन' पत्रिका के जुलाई 98 अंक में "दिगम्बर जैन आगमों के बारे में एक चिन्तन' 5, एक पठनीय लेख एम. डी. वसन्तराज का प्रकाशित हुआ है जो मूल कन्नड भाषा में लिखित लेख का लेखक द्वारा संप्रेषित हिन्दी अनुवाद है।
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40, मोती महल, सर हुकमचन्द मार्ग, इन्दौर-452001