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चाणक्य का दक्षिण गमन पहले हुआ और भद्रबाहु व चंद्रगुप्त का उसके बाद। संभवत: चाणक्य की दक्षिण यात्रा से प्राप्त संकेतों से भद्रबाह को दक्षिण में समविचार के ऋषभ जीवन शैली के लोगों का पता लग गया था।
भद्रबाहु अपनी यात्रा के प्रारंभ में अहिच्छत्र उज्जयनी होते हुए दक्षिणा पथ की ओर बढ़े थे। यदि इस यात्रा मार्ग पर भी ध्यान दिया जाय तो कई अज्ञात सत्य स्पष्ट हो सकते हैं।
भद्रबाहु की यात्रा का मुख्य उद्देश्य उत्तर दक्षिण का दृढ़ जैन संघ बनाना था। चंद्रगुप्त का सहयोग मिल जाने से इस विचार को और अधिक बल मिला होगा। निश्चय रूप से भद्रबाहु का विहार उसी मार्ग से हुआ होगा जहाँ जैन श्रावक होंगे अन्यथा इतने बड़े साधु संघ की देखभाल कैसे होती। इस यात्रा मार्ग को पाटलीपुत्र से लेकर गोमटेश्वर तक भिन्न-भिन्न मार्गों से यदि चिन्हित किया जाय और उन्हें चिन्हित करने में ज्ञात-अज्ञात श्वेताम्बर दिगंबर सभी तीर्थों के सहारे पहचाना जाय तो भद्रबाहु का दक्षिण गमन जैन इतिहास के महत्वपूर्ण पृष्ठों को खोल सकता है। मेरा सोचना ऐसा है कि हम किसी भी जैन संदर्भ को अनदेखा न करें। किसी परंपरा को रूढ़ि कहकर ठुकरा न दें। किसी पुरावे को छोटा न माने। इन सब को आधार बना कर जैन इतिहास को श्रुत से बाहर निकालकर वास्तविक आधार हम दे सकेंगे। शलाका पुरुष, तीर्थ स्थान, पाण्डुलिपियाँ, परंपरायें, तथाकथित धार्मिक मढ़तायें सभी जीवित लोगों का कार्यकलापों के परिणाम है - हमें उनके साथ अपनी सापेक्षता बढ़ानी होगी।
. ऋषभ जीवन शैली का अस्तित्व दक्षिणांचल में पार्श्वनाथ काल में भी रहा होगा।
कुछ तीर्थों की ऐतिहासिकता को यदि अधिक पारदर्शी रूप किया जा सकता तो यह विस्तार पहचाना जा सकता है।
मध्यप्रदेश के दुर्ग शहर से 16 वें कि.मी. पर कलकत्ता मुम्बई राजमार्ग पर जाल बांधा मार्ग से 9वें कि.मी. पर नगपुरा है। यहाँ श्वेताम्बर समाज द्वारा संचालित एक विशाल तीर्थ 'पारस नगर' तेजी से विस्तृत रूप ले रहा है। इस क्षेत्र में मान्यता है कि भगवान पार्श्वनाथ ने इस क्षेत्र में विहार किया था। इस तीर्थ के मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति के प्राप्त होने की भी एक रोचक कथा है। गंडक नदी के उत्तरी तट पर बीहड़ जंगल से घिरा घास फूस झोपड़ियों वाला ग्राम उगना है। यह क्षेत्र कभी प्रदेशी राजा का था। अक्टूबर 1981 में कुँआ खोदते समय जीवित सर्पो से लिपटी एक अलौकिक प्रतिमा हाथ लगी। यह प्रतिमा पार्श्वनाथ की है। स्वप्न प्रेरित हो कर यह मूर्ति वहाँ से स्थानांतरित करने का काम श्री रावल मल जैन के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ। मेटाडोर में मूर्ति ला रहे थे कि नगपुरा के पूर्व नाले के पास मेटाडोर अविचलित रूप से रूक गई अत: जन समूह को वहीं मूर्ति स्थापित करने का निर्णय लेना पड़ा। आज वहां एक विशालकाय तीर्थ आकार ले चुका है। तीर्थ व्यवस्था समिति ने घोषित किया है कि मूर्ति भगवान महावीर के काल की है और इस प्रतिमा की मंगल स्थापना उस समय हुई थी जब महावीर केवल 38 वर्ष के थे तथा पार्श्वनाथ के गणधर आचार्य सुकेशी ने यह कार्य किया था। इस संदर्भ को यदि अधिक पारदर्शी बनाया जा सके तो जैन इतिहास अधिक स्पष्ट हो सकता है।
इसी प्रकार पैठण (महाराष्ट्र) में भगवान मुनिसुव्रतनाथ की मूर्ति है। यह राजा करदूण
अर्हत् वचन, जनवरी 99
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