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________________ इसे पांड्य राजकुमार ने पंसद नहीं किया। अत: एक रात्रि को मुनि संघ ने पांड्य राजधानी से विहार कर दिया - प्रत्येक ने ताड़पत्र पर एक एक दोहा लिखकर पीछे वहीं छोड़ दिया। इन दोहों के संग्रह को 'नलादियार' कहते हैं।' जैन और अजैन आज भी दक्षिण भारत में इस परंपरा को मानते हैं। अर्थात् ईसा से तीन शताब्दी पूर्व भी जैन चिंतन के लिखे जाने का संकेत है। भद्रबाहु के दक्षिण गमन के पूर्व पांड्य प्रदेश में जैन समर्थक राज्य था यह भी सिद्ध होता है। प्रो. चक्रवर्ती ने इस विचार को दोहराया है कि 'जैन धर्म का दक्षिण भारत से परिचय ईसा से 400 वर्ष पूर्व होना चाहिए'। यह आर्यों के दक्षिण भारत में अस्तित्व से पहले का समय है। यहाँ इस पर प्रश्न उठता है कि दक्षिण भारत में ऋषभ जीवन शैली कब और कैसे पहुँची जबकि ऋषभदेव का जन्म उत्तरांचल (अयोध्या) में हुआ। इस बात में कोई मतभेद नहीं कि जैन चिंतन उत्तर भारत से दक्षिण गया किन्तु यह कहना भ्रमपूर्ण है कि जैन चिंतन भद्रबाह के साथ दक्षिण भारत गया। ऊपर हमने देखा कि भद्रबाहु के पहले दक्षिण भारत में ऋषभ जीवन शैली का अस्तित्व था। ईसा से चार शताब्दि पूर्व श्रीलंका में जैन चिंतन का अस्तित्व पाया गया। निश्चित रूप से यह कंलिग्य पांड्य क्षेत्र से होकर श्रीलंका पहुँचा होगा या ऋषभ जीवन शैली के अनुयाई 5000 वर्ष पूर्व हड़प्पा मोहनजोदड़ों के क्षेत्र से आर्यों के दबाव के कारण या बाढ के कारण या अन्य किसी भी कारण से अपना वतन छोड़ने के लिये बाध्य हए हों और वे राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र होते हुए दक्षिण की ओर विस्थापित हो गये हों। साथ ही वे विंध्याचल को पार कर मध्य पूर्व भारत के क्षेत्रों में पहुँच गये हों। हड़प्पा संस्कृति उन्नत कृषि प्रधान संस्कृति थी और दक्षिणांचल के क्षेत्र में ज्ञात इतिहास के आधार पर ऐसी संस्कृति के अस्तित्व का ज्ञान होता है। संत 'तिरूवल्लुवार' ने - 'तिरुक्कुरल' के पद्यों के माध्यम से पहली शताब्दि में जिस समाज के लिए अपना संदेश दिया वह कृषि प्रधान समाज की लंबी समृद्ध परंपरा का सूचक है। प्रो. चक्रवर्ती, श्री सुब्रह्मण्यम ने गहरी समीक्षा के साथ इसे रेखांकित किया है। उनका मत है कि तिरुवल्लुवार कुन्दकुन्दाचार्य ही थे। दक्षिणांचल में ऋषभ या ऋषभ परंपरा के तत्कालीन संतों के अस्तित्व का संकेत श्रीमदभागवत से प्राप्त होता है 'वे (भगवान ऋषभदेव) अपने अन्त:करण में अभेद रूप से स्थित परमात्मा को अभिन्न रूप से देखते हुए, वासनाओं की अनुवृत्ति से छूटकर, लिंगदेह के अभिमान से भी मुक्त हो कर उपराम हो गये। इस प्रकार लिंग देह के अभिमान से मुक्त भगवान ऋषभदेवजी का शरीर योगमाया की वासना से लेकर अभिमाना भास के आश्रय ही इस पृथ्वी तल पर विचरता रहा। वह देववश कोंक, वेंक और दक्षिण आदि के कुटक कर्णाटक के देशों में गया और मुंह में पत्थर का टुकड़ा डाले तथा बाल बिखरे उन्मत्त के समान दिगम्बर रूप से कुटका चल के वन में घूमने लगा। इसी समय बाँसों के घर्षण से प्रबल दावाग्नि धधक उठी और उसने सारे वन को अपनी लाल लपटों में लेकर ऋषभदेवजी के सहित भस्म कर दिया।' - भद्रबाहु और चाणक्य दोनों ही समकालीन थे। हो सकता है चन्द्रगुप्त के जीवन का पूर्वार्ध चाणक्य के साथ जुड़ा हो और उत्तरार्ध भद्रबाहु के साथ। अर्हत् वचन, जनवरी 99
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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