________________
. जनसंख्या का विस्फोट हुआ। विचारों, आस्थाओं और प्रजातियों के मिलन से साधारण
जनसमूह के सोच में अन्तर आया। संपत्ति, उद्योग एवम् कर प्रणाली के विकास ने आकर्षण और संघर्ष के कई मुद्दे पैदा किये। जैन चिंतन पर भी उसका प्रभाव पड़ा। जैन संघ में भी सुविधा और अन्य दबावों के कारण जीवनशैली में परिवर्तन का विचार बढ़ रहा था। श्रुत परंपरा ने यद्यपि जैन दर्शन और ज्ञान की धारा को निरंतर प्रवाहित रखा किन्तु उसमें कमी तो आई ही। स्वयं जैन इतिहासकारों ने इसे स्वीकार किया
वैचारिक संघर्ष व ईर्ष्या ने जैन संत चाणक्य का दु:खद अन्त कर दिया था। चन्द्रगुप्त को उन परिस्थितियों का आभास हो गया होगा जिसके तहत चाणक्य को बचाना संभव नहीं रहा होगा। जैन संदर्भो के अनुसार' अपना लक्ष्य पूरा कर चाणक्य ने जैन दीक्षा ले ली। वह अपने 500 शिष्यों के साथ गतियोग (पदयात्रा) से दक्षिणा पथ स्थित 'वनवास' स्थान पहुँचा और वहाँ से पश्चिम दिशा में कहाक्रोंचपुर के एक गोकुल नाम के स्थान में वह ससंघ कायोत्सर्ग मुद्रा में बैठ गया।.......सुबन्धु (नन्द नरेश का पूर्व मंत्री और महाक्रोंचपुर का मंत्री) ने बदले की भावना से चाणक्य के चारों और घेराबन्दी कर आग लगवा दी जिससे सभी साधुओं के साथ उसकी मृत्यु हो गई। कर्नाटक प्रान्त का एक भाग वनवास जनपद के अन्तर्गत था। चाणक्य अपने परवर्तीकाल में जैन विचारों से प्रभावित हो गये थे यह उनके ग्रंथ अर्थशास्त्र के अध्ययन से भी पता लगता है। 'कौटिल्य का राज्य पुरोहित सत्ता का अनुयायी नहीं है। कारण वह राज्य सत्ता की नींव कमजोर करने वाले ब्राह्मण और ब्राह्मणेत्तर धार्मिक रीति-रिवाजों की न केवल उपेक्षा करके चलता है
बल्कि उनका दमन भी करता है। 2 2. भद्रबाहु को ज्ञात था कि दक्षिण भारत में 'ऋषभ जीवन शैली' के समर्थक हैं और
उन सबको जोड़कर एक सशक्त अखिल भारतीय जैन संघ को सार्थक बनाया जा सकता
इस जानकारी के आधार पर ही भद्रबाहु ने ससंघ दक्षिण गमन का विचार किया। इतने बड़े समूह को लेकर मित्र प्रदेश में ही जाया जा सकता है। दक्षिणांचल पहुंचने पर मुनिसंघ का ऋषभ जीवन शैली वाले जनसमूह एवम् राज्य प्रमुखों ने हृदय से स्वागत किया। यद्यपि भद्रबाहु को अस्वस्थता के कारण चन्द्रगिरी पर रुक जाना पड़ा किन्तु विशाखाचार्य के नेतृत्व में यह संघ कोला एवम् पांड्य प्रदेश तक गया था। उन प्रदेशों में उन्हें प्राकृतिक गुफाओं में सहजता से पत्थर के बिस्तर व तकिये प्राप्त हुए जो एक परंपरा के सूचक हैं।
पांड्य प्रदेश में तो जैन साधुओं के लिए अपार प्रेम हो गया था। इस सत्य के समर्थन में प्रो. चक्रवर्ती द्वारा दिया गया यह प्रकरण महत्वपूर्ण हैं - 'आठ हजार जैन साधु जो पांड्य प्रदेश में दुर्भिक्ष के कारण आये और ठहरे और जब उन्होंने जाना चाहा तो
अर्हत् वचन, जनवरी 99