SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 42
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ है चंदगुप्त व भद्रबाहु ने यही बीड़ा उठाया था और विशाखाचार्य के साथ 11000 साधु संतों ने दक्षिणांचल गमन का निर्णय किया। हो सकता है इस दक्षिण गमन ने उत्तर भारत में जैन समूह को विभाजित किया हो। जैन संगीति की सफलता को संदिग्ध बना दिया हो। राजकीय व चारित्रिक शक्ति को देखते हुए दुर्भिक्ष का भय कितना होगा इसको पुनः मूल्यांकित किया जाना चाहिये। हो सकता है जैन संगीति की तैयारियों के बीच ऐसा कुछ हो गया हो जिससे भद्रबाहु संतुष्ट न हो और उन्होंने दक्षिण गमन का निर्णय ले लिया हो। हो सकता है भद्रबाह ने प्रस्ताव किया हो कि दक्षिणांचल के जैन साधुओं को इस संगीति में जोड़ा जाय और इस मुद्दे को लेकर विभाजन हो गया हो। यह सब संभावनायें हैं। सत्य को उजागर होना बाकी है किन्तु घटनाओं से संकेत अवश्य मिलता है कि कुछ न घट सकने वाली समस्या अवश्य पैदा हुई होगी। श्रावकों ने तो भद्रबाहु से विनय की थी कि दुष्काल में वे अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे और वे दक्षिण गमन न करें। पर भद्रबाहु इससे सहमत नहीं हुए, क्यों? इसका उत्तर ढूँढना होगा। क्या चंद्रगुप्त के राज्याश्रय और भद्रबाह के धार्मिक आश्रय के अभाव में जैन समूह को कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा होगा। समस्त श्वेतांबर और दिगम्बर साहित्य के उस काल के संकेतों को एकत्रित कर - पाटलीपुत्र के इतिहास - सामाजिक व धार्मिक परिस्थिति के साथ उनका जायजा लिया जाय तो कुछ सत्यों पर से पर्दा हट सकता है। ईसा पूर्व तृतीय शती में भद्रबाहु का चंद्रगुप्त विशाखाचार्य एवम् अन्य 11000 साधु - साध्वियों के साथ दक्षिण बिहार हुआ। इस सत्य को सिद्ध करने के लिये, शिलालेखों, दान पत्रों, इतिहास के शोध ग्रन्थों एवम् पुराणों से बहुत सी सामग्री एकत्रित है। अत: अन्य रूप से सोचने का अब कोई कारण नहीं है। भद्रबाह के द्वारा इस विहार का निर्णय लेना कोई साधारण बात नहीं है। यह जैन संघ की अखिल भारतीय एकता को परिभाषित करने का महत्वपूर्ण कदम था। भद्रबाह स्वयं उत्तर भारत संघ के आचार्य थे तथा दर्शन, ज्ञान व चरित्र के साकार रूप थे। __भद्रबाहु ने ऐसा निर्णय क्यों लिया इसके संदर्भ अब स्पष्ट हो रहे हैं। कुछ को हम क्रम बद्ध करने का प्रयास करते हैं - 1. 'ऋषभ जीवन शैली' जिसे हम 'जैन जीवन शैली' कहते हैं पर उत्तर भारत में गहरा दबाव पैदा हो रहा था। - नंदवंश का अन्त और मौर्य साम्राज्य का अभ्युदय हुआ। (321 ई. पूर्व) मौर्य साम्राज्य संभवत: ज्ञात सर्वप्रथम साम्राज्य था। इन दोनों वंशों के जैनावलम्बी होने के प्रभावी संकेत हैं। सत्ता कभी कभी कई अन्तर्विरोधों को जन्म देती है। हो सकता है साधु संतों में ऐसा हो गया हो। . उत्तर पश्चिम सीमाओं पर यूनानी हमलों का दबाव पैदा हो गया था। हो सकता है इस कारण वेदावलंबियों का पूर्व की ओर अधिक दबाव बढ़ा हो और वैदिक जीवन शैली और ऋषभ जीवन शैली में अधिक टकराव हो गया हो। महावीर ने अहिंसक संस्कृति को जो विस्तार दिया उस पर बौद्ध और वैदिक दोनों ही धाराओं ने दबाव डाला। अर्हत् वचन, जनवरी 99
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy