SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 41
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रति अपनी अगाध श्रद्धा प्रदर्शित की और आज भी वह अक्षुण्ण है। पाटलीपुत्र ने 500 ई. पूर्व से 372 ई. पूर्व के 128 वर्ष के काल में शक्ति दभत विकास देखा। एक छोटा सा दर्ग विशाल मौर्य साम्राज्य की राजधानी के गौरव में बदलने के पहले नंदों के शक्तिशाली - समृद्ध केन्द्र के रूप में बदल चुका था। अपार संपत्ति और शक्ति पाटलीपुत्र में केन्द्रित हो चुकी थी। चाणक्य और चंद्रगुप्त की व्यावहारिक राजनीति ने नंदों को परास्त कर जब पाटलीपुत्र पर अपना अधिकार बनाया उस समय . कैसे युद्ध हुए - इसका विस्तृत अध्ययन अभी शेष है। भद्रबाहु को अपने जैन अनुयाइयों के साथ गांगेय प्रदेश में ही होना चाहिए। चन्द्रगुप्त क्यों भद्रबाहु का इतना भक्त बना कि वह ऐसे शक्तिशाली साम्राज्य को छोड़कर दिगंबरत्व को धारण कर सन्यासी हो गया। वे कौन से कारण थे जिसके कारण चाणक्य और चंद्रगुप्त दोनों ही सत्ता शक्ति से विरक्त होकर तप - त्याग और अपरिग्रह के पथ के राही हो गये। ___ एक बात पर ध्यान जाता है कि भद्रबाहु चाणक्य और चंद्रगुप्त तीनों ने ही दक्षिणांचल को अपने अंतिम दिनों में जीवन शैली की दृष्टि से अधिक उपयुक्त माना - उसके कुछ कारण निम्न प्रकार हो सकते हैं - • 1. मौर्य साम्राज्य के अभ्युदय के साथ कुछ विसंगतियाँ उभरने लगी होंगी। इस विसंगति के आधार में राज्य परिवार की महत्वाकांक्षा, विदेशी राजनयिकों की उपस्थिति और असंतुष्टों की भेदनीति प्रमुख थी। 2. जातिविहीन सोच के समर्थक जैन और बौद्ध धर्मों का काफी प्रचार हो चुका था। ब्राह्मणवाद का भी अस्तित्व था अत: धार्मिक द्वंद बढा होगा। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ऐसे कई प्रकरण हैं जिनसे इस द्वंद के संकेत मिलते हैं। पुराणों में इस द्वंद को खुले रूप में स्वीकार किया गया है। संदर्भो के अध्ययन से लगता है जातिवाद धार्मिक आतंकवाद का रूप लेने लगा था। 3. कुछ अनुश्रुतियों के अनुसार नंदों के वरिष्ठ महामंत्री शगड़ाल (शकटार) को चंद्रगुप्त का महामंत्री बनाया गया था। शकटार के पुत्र स्थूलिभ्रद जैन सुप्रसिद्ध संत थे। अर्थात् चंद्रगुप्त व चाणक्य की आस्था ऐसे लोगों में थी जिनका जैन -धर्म पर विश्वास था। भद्रबाहु से संपर्क ने हो सकता है चन्द्रगुप्त की इन आस्थाओं को अधिक ऊँचाइयाँ दी हो। यह वह संकेत है जो चंद्रगुप्त चाणक्य के सोच को प्रदर्शित करता है। उनके जैन धर्म के प्रति लगाव को प्रदर्शित करता है। 4. इतिहास के संकेत है कि बुद्धिजीवियों, व्यवसाइयों, उद्योगपतियों का महत्व मौर्य चंद्रगुप्त के समय में बहुत अधिक था और यही सब लोग अधिक मात्रा में जैन धर्मावलम्बी थे। भावुक चद्रगुप्त पर इन सब का प्रभाव पड़ा हो यह सभव है। 5. राज्य विस्तार व संचालन के दौरान निश्चयपूर्वक चंद्रगुप्त और चाणक्य को यह ज्ञान हो गया कि दक्षिण भारत में ऋषभ परम्परा के जैन धर्मावलम्बी बहुतायत में हैं। 6. भौगोलिक कठिनाइयाँ, संचार साधनों की कमी तथा अन्य धर्मों की असहिष्णु व्यवहार के कारण जैन समूह उत्तर व दक्षिण में बंटा हआ था। आवश्यकता थी किसी ऐसे नेतृत्व की जो जैन संघ को भारत में राष्ट्रीय रूप में स्थापित कर सके। ऐसा लगता अर्हत् वचन, जनवरी 99 39
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy