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________________ से 8 वीं शती पर्यंत राज किया। ये शैव धर्मानुयायी थे। सपना चौथा वंश सोमवंश था, इसका सम्बन्ध कलिंग देश के कोसल प्रान्त से था। पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती इसकी दो शाखायें थीं। प्रथम शाखा ने चौथी से छठी शती पर्यन्त राज्य किया। इस वंश ने बौद्ध धर्म को प्रश्रय दिया। दूसरी शाखा ने 6ठीं शताब्दी से 12 वीं शताब्दी तक राज्य किया। चीनी यात्री हुएनसांग (629-643 ई.) ने भ की थी। हएनसांग के समय कोसल और त्रिकलिंग का अधिपति कोई सोमवंशी राज है। यह महायानी बौद्ध सम्प्रदाय का अनुयायी था। उसकी राजमहिषी जैन धर्म की भक्त थी। कार्तिक अष्टाह्रिका पर्व पर रानी ने जिनेन्द्रोत्सव मनाने का निश्चय किया। किन्तु राजा के बौद्ध गुरु इसमें बाधक हुए। अन्तत: राजा ने निर्णय दिया कि कोई जैनाचार्य बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में हरा देंगे तो जैन रथ निकालने की अनुमति दे दी जावेगी। रानी तथा अन्य जैन बडे चिंतित हए। सौभाग्य से इसी समय महाराष्ट्र के दिग्गज जैनाचार्य (आचार्य अकलंक देव) नगर के बाहर उद्यान में आकर ठहरे थे। उन्होंने चुनौती स्वीकार की। छह महीने तक विवाद चला। बौद्ध लोग तारादेवी की सहायता से शास्त्रार्थ कर रहे थे। अकलंकदेव ने घर में स्थापित तारा देवी का विस्फोट किया और बौद्धों को पराजित किया। राजा पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा और उसने जैन धर्म अंगीकार किया। अनेक बौद्धों को निष्काषित होना पड़ा और वे सुदूर पूर्व के भारतीय राज्यों में चले गये। हर्ष को जब यह समाचार मिला वह कलिंग पर सेना के साथ चढ़ आया। हिमशीतल युद्ध में मारा गया। इधर अकलंकदेव ने चालुक्य राजधानी में अपने भक्त चालुक्य सम्राट साइसतुंग को इस वाद का समाचार सुनाया तो प्रसन्न हुआ और हिमशीतल की सहायता को पहुँचा। वह हिमशीतल की रक्षा तो न कर सका, परन्तु हर्ष पराजित होकर वापिस लौट गया। इस प्रकार कोसल राज्य की रक्षा हो गई। ये घटनायें सन् 642-44 ई. की हैं। उत्तरवर्ती सोमवंशी शनैः शनै: शैव और वैष्णव धर्म के अनुयायी हो गये। चीनी यात्री के विवरणों तथा पुरातत्व, जैन अनुश्रुतियों से पता चलता है कि 8 वीं शती ई. तक सम्पूर्ण कलिंग देश में जैन धर्म अच्छी दशा में था। जैन शास्त्रीय विवरण एवं उड़िया के इतिहास और संस्कृति के उद्धरणों से यह स्पष्ट हो गया है कि उड़ीसा के जन-जीवन में जैन धर्म का प्रभाव अत्यन्त प्राचीन काल से रहा है। स्वयं तीर्थंकर ऋषभदेव ने उड़ीसा में आकर धर्म प्रचार किया। जैन धर्म उड़ीसा का राष्ट्र धर्म था। कलिंग के राजा जैनी थे और प्रजा तीर्थंकरों की उपासना करती थी। जैन धर्म का अहिंसा ध्वज पूर्ण रूप में कलिंग में फहराता रहा है। जैन राजाओं और धनिकों ने उड़ीसा की भव्य भूमि को मनोहारी मंदिरों और अद्भुत गुफाओं से सुसज्जित कर बानपुर - तीर्थकर चन्द्रप्रभ की कांस्य मूर्ति दिया। जैन मूर्तियों की वीतरागता ने कलिंग वासियों के हृदयों (भुवनेश्वर संग्रहालय) पर एक छत्र अधिकार कर लिया था। ऋषभदेव की मूर्ति सारे देश की गौरव निधि बताई गई और 'कलिंङ्ग जिन' के नाम से प्रसिद्ध हुई। नन्दराज अर्हत् वचन, जनवरी 99 27
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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